गुरुवार, 30 सितंबर 2010

इंसानियत का बरगद...

(अयोध्या और उस तरह के तमाम मामलों से ये कहानी उपजी है....क्योंकि इंसानियत बरगद वाकई ठूंठ रह गया है....)
कहीं, किसी शहर में, एक सड़क पर
एक पंछी ने
कुछ बीज छिटकाए
मौसम ने
कुछ बीज पनपाए
उगा एक
बरगद
उस मंदिर के आंगन में
बढ़ता गया
हो गया आदमकद
फिर बन गया बुत
औरतों ने
उस पर धागे कसे
परिक्रमा की, उपवास रखे
उसकी डालियों पर, जटाओं पर झूले
बच्चे हंसे ,
हुआ वो गदगद
और चढ़ा, और बढ़ा
बढ़ती ऊंचाई, फैलती शाखाएं
झूमती जटाएं
निकल मंदिर के आंगन से
पहुंची पड़ोस के बरामदे में
छा गई
मस्जिद के वजू के हौज पर
छांव करने लगीं नमाज़ियों के सर
बरगद पर बसने लगे
परिंदे
बुनने लगे घोंसले
किसी को भगवान मिला
किसी को खेल
किसी को छांव
और
पंछियों को घर
एक दिन मगर
शहर में आग सी बरसी
मरे इंसान
पर
गिनती में आए हिंदू-मुसलमान
बरगद
जानता न था फ़र्क करना
पर
एक दिन
उससे पूछे बिन
इंसानों ने किया गजब
बना दिया
उसका भी मज़हब
तिलक बोला, "बरगद हिंदू है"
टोपी ने कहा, "मुसलमान"
बरगद कुछ न बोला
रह गया बस हैरान
फिर तिलक त्रिशूल बन गया
टोपी तलवार
मचा हाहाकार
कुछ भी पहले सा न रहा
उस साल बारिश न हुई
बस खून बहा
अब बरगद के चारों ओर
ख़ाकी का पहरा है
जहां चहकते थे परिंदे
अब
सन्नाटा गहरा है
मंदिर में कब से
बरगद सींचा नहीं गया है
मस्जिद पर छाई डालियों को
काट दिया है
न वहां पूजा है, न नमाज़
न खेलते बच्चे हैं
न गाती औरतें
और
न सुस्ताते नमाज़ी
पंछी
जो अजान से जागते थे
आरती के वक़्त
घोंसलों में भागते थे
मंदिर में दाने चुग कर
वजू के पानी पर
झुककर
करते थे ज़िंदगी बसर
पंछी वो
अब दर बदर हैं...
मंदिर में अभी भी बज रहे हैं शंख
नमाज़ में झुक रहे सर हैं
लेकिन इंसानों के झगड़े में
बरगद ठूंठ.....
और पंछी
बेघर हैं....

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

अपनी हिंदी - काका हाथरसी

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ' , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ' कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

काका हाथरसी


काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी