गुरुवार, 28 अगस्त 2008

आखिरी कलाम.....सलाम



इससे पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें


और फिर जब लगा कि ज़िन्दगी बेवफा होने लगी है ..... फ़राज़ साहब ने ज़िन्दगी से जुदा होने का फ़ैसला ले लिया। उर्दू अदब और कलम की दुनिया का वो सितारा बुझ गया जिसने न जाने कितने दिलों को तन्हाइयों में सुकून दिया और न जाने कितने दिमागों को रोशन कर दिया।


फ़राज़ साहब दरअसल एक शख्सियत नहीं थे, वो एक किताब थे जिसे पढ़कर न जाने कितने गुमनाम लोग शख्सियत बन गए, दावे से कहा जा सकता है कि आज के उर्दू के कई बड़े शायर ऐसे होंगे जिनको शायरी करने का पहला शौक अहमद फ़राज़ साहब को सुनकर या पढ़कर हुआ होगा। और ये हाल उनके मादर ऐ वतन पाकिस्तान का नहीं हिन्दोस्तान का भी था।


उर्दू के इस सितारे की पैदाइश हुई १९३२ में पाकिस्तान के नौशेरा में, वालिद ठहरे मामूली मदरसे के टीचर सो बहुत रईसी की हालत भी नही थी। एक बार इनके वालिद इनक्जे और इनके भाई के लिए कुछ कपड़े लाये और वो इन्हे पसंद ना आए, बगावती तेवर तब पहली बार दिखे जब ये इस बात पर नाराज़ हो कर घर से भाग निकले। एक शेर जो इन्होने अपने वालिद के नाम लिख छोड़ा था वो इस तरह था,


जबकि सबके वास्ते लाये हैं कपड़े सेल से,


लाये हैं मेरे लिए कैदी का कम्बल जेल से


खैर आगे की पढ़ाई लिखाई हुई पेशावर यूनिवर्सिटी से उर्दू और फ़ारसी में और बचपन की फकीरी को सहारा मिला शायरी का। जनाब लिखने लगे .... उम्दा शायरी करने लगे। कलम एक बार चल जाती है तो फिर मौत ही उसे रोकती है। फ़राज़ साहब मशहूर शायरों में से हो गए। शुरुआत में असर रहा अल्लामा इकबाल साहब का पर बाद में प्रभावित हो गए अली सरदार जाफरी और फैज़ अहमद फैज़ से ..... बस यहीं से चल निकला सिलसिला उर्दू की तरक्की पसंद शायरी का जो इतने मुकामों से गुज़रा की पूरी दुनिया उससे मुत्तास्सिर हुई। दुनिया ने जाना और माना की फ़राज़ मुशायरों की जान है।
अब और कितनी मुहब्बतें तुम्हें चाहिए फ़राज़,
माओं ने तेरे नाम पे बच्चों के नाम रख लिए।
अहमद फ़राज़ साहब साहब शायद आधुनिक उर्दू के उन गिने चुने शायरों में से हैं जिनको जितनी शिद्दत से पाकिस्तान में अवाम मोहब्बत करता है उतना ही इश्क हिन्दोस्तान की जनता को भी उनसे था। कई लोगों ने मुझसे उनके इन्तेकाल की ख़बर आने के बाद मुझसे पूछा की "क्या फ़राज़ साहब पाकिस्तान में रहते थे ?" हिन्दोस्तान का कोई भी बड़ा मुशायरा उनके बिना पूरा नहीं हुआ। आज वो महफ़िल सूनी हो गई है।
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चिराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चिराग़

बगावत की जुर्रत ऐसी की फौजी हुकूमत के खिलाफ इतना लिखा - इतना बोला की पहले जेल में रहे और फिर मुल्क से बदर हो कर ब्रिटेन और कनाडा में ज़िन्दगी बसर की पर हमेशा दिखे मुस्कुराते हुए। आम धारणा है की किसी शायर की कुछ ही नज्में ऐसी होती हैं जो उसे यादगार कर देती हैं ..... मैं कहूँगा की ज़रा फ़राज़ साहब को पढ़ कर देखें। इतना कुछ और हर बार उतना ही कमाल ...
फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं
मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं
ऐसे शेर कि आप याद कर कर के लाजवाब हो जाएँ ,
यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद
ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिए रंगे-महफ़िल
सबको मदहोश करे होश से जाए ख़ुद भी
दिनकर जी अपनी एक कविता में कहते हैं कि पंछी और बादल भगवान् के डाकिये हैं जो एक मुल्क से दूसरे मुल्क में स्नेह का पानी बरसाने ...... बिना वीसा के ....... फ़राज़ साहब ज़िन्दगी में भले ही बिना वीसा के सरहदों को पार न कर पाये हो, उनका सुखन और अब उनकी यादें सरहदों की दीवारों की कैदी और सरकारों की रहमतों की मोहताज नहीं। उनका बदन अब ख़ाक के सुपुर्द है और उनकी रूह हम सब के अन्दर ......
जैसा कि वो ख़ुद कह गए


ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें के
जो रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जायेंगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जायेंगे
ख़्वाब मरते नहीं

रविवार, 24 अगस्त 2008

बृजभाषा के महानतम कवियों में से एक हुए हैं रसखान। रसखान बृजभाषा के भक्तिमार्गी कवियों की कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों में महान इसलिए नहीं हैं की उनकी कविता उत्कृष्ट है बल्कि सबसे बड़ा तत्व यह है की वे मुस्लिम थे और उन्होंने कृष्ण भक्ति के पड़ लिखने का साहस दिखाया। सैय्यद इब्राहिम उनका वास्तविक नाम था और रसीले खान की धारणा के साथ काव्य- रचना करते हुए रसखान नाम रख लिया। एक संपन्न परिवार में पैदा होने के कारण उनकी शिक्षा अच्छी और उच्च कोटि की, की गई थी। उनकी यह विद्वत्ता उनके काव्य की साधिकार अभिव्यक्ति में जग जाहिर होते हैं। रसखान को फारसी हिंदी एवं संस्कृति का अच्छा ज्ञान था। फारसी में उन्होंने "श्रीमद्भागवत' का अनुवाद करके यह साबित कर दिया था।

ताज़ा हवा में आज श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के अवसर पर अपने सुधी पाठकों के लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं रसखान के कुछ ऐसे पद जो बचपन से मुझे प्रिय हैं ....

  • मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
    जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
    पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
    जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

  • धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
    खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
    वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
    काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।

  • कर कानन कुंडल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजती है
    मुरली कर में अधरा मुस्कानी तरंग महाछबि छाजती है
    रसखानी लखै तन पीतपटा सत दामिनी कि दुति लाजती है
    वह बाँसुरी की धुनी कानि परे कुलकानी हियो तजि भाजती है

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

जनतंत्र का जन्म !




ये कविता मुझे बहुत पसंद है..... आज के दिन ये एक उम्मीद...एक अभिलाषा और एक प्रार्थना है की जनतंत्र का नया जन्म हो ! परिस्थितिया बदल उठे ....



सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,


मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;


दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,


सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।


जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,


जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,


जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे


तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।


जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,


"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"


"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"


'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"


मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,


जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;


अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के


जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।


लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,


जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;


दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,


सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।



हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,


सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,


जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?


वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।


अब्दों,शताब्दियों,सहस्त्राब्द का अंधकार बीता;


गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;


यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय


चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।


सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,


तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो


अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,


तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।



आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,


मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?


देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,


देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।


फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,


धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;


दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,


सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।



रामधारी सिंह दिनकर

सोमवार, 11 अगस्त 2008

बिंद्रा.....सलाम !



यह अद्भुत दृश्य था.....विहंगम...कुछ विशवास नहीं कर पा रहे थे, कुछ मुस्कुरा रहे थे, कुछ चीख रहे थे और बाकी आंसुओं से भीगे थे ! दृश्य ही कुछ ऐसा था, तिरंगा लहरा रहा था और वो भी बीजिंग में ! जी हाँ .... और इसलिए क्यूंकि ओलम्पिक में भारत ने १९८० के बाद पहला स्वर्ण पदक जीता है। आपको भी विशवास नही हो रहा ? पर यह सच है ! यह पदक हाकी के अलावा किसी भी खेल में भारत का पहला स्वर्ण पदक है और यह इतिहास रचा है भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने ! उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल में स्वर्ण पदक हासिल किया।
जहाँ पिछले दो दिनों में एक एक करके सारी भारतीय उम्मीदें टूटती जा रहीं थी, बिंद्रा ने न केवल लाज रखी बल्कि सर गर्व से ऊंचा कर दियाइस बार हालांकि यह उम्मीद थी की हम कोई न कोई पदक जीतेंगे पर तीसरे ही दिन स्वर्ण पदक मिलना वाकई उस देश के लिए अतीव गर्व की बात है जहाँ लोग क्रिकेट के अलावा बाकी खेलों की तरफ़ आंशिक रूप से भी गर्दन नही हिलाते। हाकी टीम के ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई ना कर पाने से निराश देशवासियों के लिए ये वाकई बड़ी ख़बर है बल्कि बहुत बड़ी ख़बर !
बिंद्रा का स्कोर रहा BINDRA Abhinav 100 99 100 98 100 99 596
Final shots: 10.7 10.3 10.4 10.5 10.5 10.5 10.6 10.0 10.2 10.8 104.5
Total Score : 700.5
अभिनव बिंद्रा का यह पदक १०४ साल में देश को मिला पहला व्यक्तिगत पदक है और यह निश्चित रूप से उनकी कड़ी मेहनत का परिणाम है। भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके स्वर्ण पदक जीतने पर बधाई दी है। भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि "ये बहुत बड़ा दिन है और देश के लिए बहुत गर्व की बात है। उनका कहना था कि अभिनव बिंद्रा युवाओं के लिए एक मिसाल बन गए हैं और इससे भारतीय युवाओं को बहुत बढ़ावा मिलेगा।" "अभिनव बिंद्रा के जीतने से भारतीय राष्ट्रीय ध्वज चीन में लहराया और राष्ट्रगान बजा जिससे हम सबका सर गर्व से ऊंचा हो गया" "कलमाडी का कहना था कि इसमें कोई शक नहीं कि ये ऐतिहासिक दिन है और इसका श्रेय भारतीय शूटिंग महासंघ को भी जाता है."
ज्ञात हो कि खेल रत्न से सम्मानित इस खिलाडी को पदक के दावेदार के तौर पर बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था और न ही इस बार उनकी चर्चा ज्यादा थी लेकिन तुलसीदास ने कहा है कि सूर समर करनी करहि कही न जनावही आपु मतलब कि वीर कहते नहीं करके दिखाते हैं !
बिंद्रा तुम शूरवीर हो !
तुम लड़े....ऐसे देश में जहाँ लड़ना दुष्कर है
तुम लड़े ..... परिस्थितयों से
तुम लड़े....... समय से
तुम लड़े ....... अपने लिए नहीं, हम सबके लिए
तुम लड़े ...... देश के लिए
तुम जीते ..... इन सबके लिए
तुमको मिला सम्मान हमको मिला गौरवबोध है !
बिंद्रा ......... जीते रहो !!!

रविवार, 10 अगस्त 2008

करूणाकर का निधन ..........



यह सब लिखते हुए उंगलियां कांप रहीं हैं

पर जो सच है उसे हिम्मत करके कहना ही पड़ेगा।


करूणाकर नहीं रहे।


मौत के आगे हार गई जिंदगी।


हमारी कोशिशें काम नहीं आईं।

पढ़े.......

http://bhadas.blogspot.com/2008/08/blog-post_4282.html

शनिवार, 2 अगस्त 2008

युगांत ......




१८ मई, 2008 की रात, जगह थी नॉएडा के सेक्टर १२ के मेट्रो हॉस्पिटल का क्रिटिकल केयर सेंटर ......... मैं शांत और स्तब्ध खडा एक युग को अपने अवसान की ओर जाते देख रहा था........ देख रहा था एक भीष्म को शैया पर पड़े .... और सोच रहा था कि हाँ ये वाकई एक युग का अंत है। मैं तो मैं हूँ ही और यहीं हूँ पर वो युग आज बीत गया, भीष्म आज इच्छा मृत्यु को प्राप्त हो गया ........ और वो भीष्म थे हरकिशन सिंह सुरजीत...... भारतीय वामपंथ के पितामह ! मैं तब नोइडा में एक अदद मीडिया की नौकरी के लिए मन मार रहा था और तभी पता चला कि सुरजीत जी मेट्रो में भरती हैं...... पुराना सोशलिस्ट मन जोर मार गया और रात के ९ बजे मोटर साइकिल का हैंडिल अपने आप ही मुड गया मेट्रो हॉस्पिटल की ओर ....


गेट पर गार्ड से पूछा कि सुरजीत जी यहीं भर्ती हैं ...... सर हाँ में हिला इशारा किया रिसेप्शन की ओर , रिसेप्शन पर कहा गया कि ऊपर दूसरी मंजिल पर क्रिटिकल केयर सेंटर में हैं ! ऊपर पहुंचा तो अजीब सी शान्ति मिली, बहुत भीड़ भाड़ नहीं, कोई उत्साही समर्थक नहीं; ना ही पार्टी नेताओं का जमावडा ....... सिर्फ़ दो घरवाले और लुधियाना से आए दो रिश्तेदार ! पहले बाहर बैठने को कहा गया तो मुलाक़ात हुई सुरजीत जी के बड़े बेटे से जो ब्रिटेन के ग्लासगो शहर से आए थे और आजकल वही रहते हैं ........ पता चला कि स्थिति ज्यादा नाज़ुक है ....... सुरजीत जी कोमा में हैं ही और फेफडे तथा गुर्दे दोनों ही काम नही कर रहे थे। उनके रिश्तेदारों से भी उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ चर्चा हुई और बेशक वे उनके राजनीतिक जीवन के बारे में बहुत नही जानते थे पर उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में ज़रूर जानकारी मिली।
तभी बाहर आए उनके पौत्र जो उनकी देखरेख कर रहे थे ....... मेरे ये बताते ही कि छात्र जीवन में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया से जुडा रहा था तुंरत उन्होंने कहा कि आप साथ आयें और मुझे अन्दर ले गए, सामने की शैया पर मैंने वो देखा जो अब तक किताबो में पढा था ........ एक युग का अंत ! बिस्तर पर तमाम तरह की नलियों और उपकरणों के बीच में कुछ साँसे संघर्ष कर रही थी ....... पहली बार सुरजीत जी को बिना पगड़ी के देखा, देख रहा था एक युग को अचेतन अवस्था में और याद कर रहा था जब पहली बार उनको लखनऊ में और फिर सैकडो बार टीवी पर देखा था।
जितना जानता हूँ उनके बारे में वो सब आज याद आ रहा है क्यूंकि आज १ अगस्त २००८ को अब वे हमारे बीच नहीं हैं ........... एक आम नागरिक के तौर पर हम सब उनके बारे बस यही जानते हैं कि वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के भूतपूर्व महासचिव और सबसे बुजुर्ग कम्युनिस्ट थे, कई लोग उन्हें वयोवृद्ध कामरेड के या कामरेड सुरजीत के नाम से भी जानते थे। उनको लेकर कई विवादित मुद्दे भी रहे और बिल्कुल ये दूसरो से और भीड़ से अलग होने की कीमत भी है कि आपको प्रसिद्द होने के साथ विवादित भी होना पड़ेगा।


कामरेड सुरजीत का जन्म २३ मार्च १९१६ को जालंधर जिले के बुन्दाला में एक बस्सी जाट परिवार में हुआ, इसे संयोग कहें या विधि कि भगत सिंह के इस कट्टर अनुयायी का जन्म १९२६ में उसी दिन हुआ जिस दिन १९३१ में भगत सिंह को फांसी दी गई। १९३० में सुरजीत ने किशोरावस्था में ही भगत सिंह की नौजवान भारत सभा की सदस्यता ले ली और आज़ादी की क्रांतिकारी आन्दोलन में कूद पड़े। २३ मार्च १९३२ को भगत सिंह के पहले शहादत दिवस पर सुरजीत ने होशियारपुर कचहरी परिसर में तिरंगा लहरा दिया जिसमे इन्हे दो गोलियाँ मारी गई, अदालत में पेश किए जाने पर जज को इन्होने अपना नाम लन्दन तोड़ सिंह बताया।
रिहाई के बाद सुरजीत पंजाब के साम्यवादियों के संपर्क में आए और १९३६ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली, १९३८ में सुरजीत किसान आन्दोलन से जुड़ गए जब पंजाब किसान संघ की नींव पड़ी और वे उसके महासचिव बनाए गए। उसी साल उन्हें ब्रिटिश सरकार ने पंजाब से बाहर जाने का फरमान सुना दिया, यहाँ से वे पहुंचे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और वहां से चिंगारी नाम की इंकेलाबी पत्रिका निकालने लगे। तभी द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और उनको भूमिगत होना पड़ा। फिर उन्हें गिरफ्तार करके लाहोर किले में क़ैद कर दिया गया। १९४४ में वे वहाँ से रिहा हुए और दोबारा किसान आन्दोलन में जुट गए। तभी देश आजाद हो गया ....... इस दौरान बंटवारे को लेकर हुए दंगो में हिंसा रोकने और सदभाव फैलाने की सुरजीत की कोशिशों को लोग आज भी याद करते हैं।


१९५४ में भाकपा के तीसरे अधिवेशन में वे पार्टी की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में चुने गए। वो इन पदों पर १९६४ में पार्टी के टूटने तक रहे फिर १९६४ में विवादित घटनाक्रम में भाकपा मार्क्सवादी की स्थापना हुई और तब से अप्रैल २००८ तक वे पार्टी के वरिष्ठतम क्रम पर रहे। यही नही पिछले दस सालो में गठबंधन की राजनीती में भी सुरजीत हमेशा धुरी बने रहे। अप्रैल २००८ में गिरते स्वास्थ्य की वजह से सुरजीत ने पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया।
१९६२ में (कथित साम्यवादी) चीन के हमले के दौरान चीन का समर्थन करने वाले नेताओं में सुरजीत भी शामिल थे और ये विवाद जीवन पर्यंत उनके साथ जुड़े रहे। सुरजीत का ये कदम उनके पूरे राजनैतिक जीवन का सबसे ग़लत कदम माना जा सकता है पर फिर भी इसे सबसे दुस्साहसिक कदम भी कहेंगे ....... ऐसा दुस्साहस सुरजीत हमेशा करते रहे !


सुरजीत उन साम्यवादियों में रहे जो विवादित तो रहे पर कई मामलो में उनके विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वैसे भी कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं पर उसके कुछ महान काम उसकी तमाम गलतियों पर भारी पड़ते हैं। उनका दुस्साहस यह भी था कि एक ज़बरदस्त विवाद की आधार भूमि पर एक नयी पार्टी बना दी और आज वो देश की सबसे बड़ी साम्यवादी राजनैतिक पार्टी है .......... ये श्रेय उनसे नहीं छीन सकते हम .......... हम में से कितने लोग एक झंडा फहराने के लिए सीने पर गोलियाँ खाने को तैयार हैं ? ...... हम में से कितने किसानो के हक के लिए अपनी जायदाद बेच देंगे ? हम में से कितने लोग खालिस्तान अलगाववादियों के ख़िलाफ़ खुल कर खड़े हो गए था ?
१८ मई की रात मेट्रो हॉस्पिटल में मेरे सामने सुरजीत जी कोमा में पड़े मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे ................ और मैं पहुँच गया था लखनऊ के उस वक़्त में जब मेरी उनसे पहली और चेतन अवस्था में आखिरी भेंट हुई थी !


...... तब मैंने उनसे अभिवादन करते हुए कहा था


' कामरेड लन्दन तोड़ सिंह को मेरा सलाम '


और उधर से जवाब आया कि


" लन्दन क्या जो भी चीज़ तुम पर ज़बरदस्ती थोपी जाए उसे तोड़ डालो ! "
यादों से लौट कर मैं फिर हॉस्पिटल में था........और सोच रहा था कि क्या उनसे ऐसी ही दो मुलाकातें होनी थी .... एक जिसमे ऐसा जोश था और एक में जिंदगी के अंत का सन्नाटा ? फिर अचानक देखा कि सुरजीत जी ने अवचेतन अवस्था में एक बार ज़ोर से साँस ली .... जैसे कहना चाहते हों कि लड़ाई तो हमेशा ही है, चाहे दुनिया से या ख़ुद से ! मैं फिर शांत था क्यूंकि देख लेना चाहता था पूरे ध्यान से और चाहता था कि हमेशा के लिए हिस्सा बन जाऊ उस युग का जो अब ख़त्म हो गया...........
मेरे सामने भीष्म की भांति एक युग और वाकई भारतीय राजनीति शर शैया ही है ..... एक महागाथा अपनी परिणिती की ओर थी .............. आज वो पूर्ण हुई ! विवाद तो होंगे ही ..... गलतियां भी होनी ही हैं पर युग तो युग है ........ यह एक युग की समाप्ति थी ....भारतीय साम्यवाद के !


मयंक सक्सेना


९३११६२२०२८ mailmayanksaxena@gmail.com

काल चक्र

हिन्दी फोनेटिक कुंजी पटल

देवनागरी