रविवार, 24 अगस्त 2008

बृजभाषा के महानतम कवियों में से एक हुए हैं रसखान। रसखान बृजभाषा के भक्तिमार्गी कवियों की कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों में महान इसलिए नहीं हैं की उनकी कविता उत्कृष्ट है बल्कि सबसे बड़ा तत्व यह है की वे मुस्लिम थे और उन्होंने कृष्ण भक्ति के पड़ लिखने का साहस दिखाया। सैय्यद इब्राहिम उनका वास्तविक नाम था और रसीले खान की धारणा के साथ काव्य- रचना करते हुए रसखान नाम रख लिया। एक संपन्न परिवार में पैदा होने के कारण उनकी शिक्षा अच्छी और उच्च कोटि की, की गई थी। उनकी यह विद्वत्ता उनके काव्य की साधिकार अभिव्यक्ति में जग जाहिर होते हैं। रसखान को फारसी हिंदी एवं संस्कृति का अच्छा ज्ञान था। फारसी में उन्होंने "श्रीमद्भागवत' का अनुवाद करके यह साबित कर दिया था।

ताज़ा हवा में आज श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के अवसर पर अपने सुधी पाठकों के लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं रसखान के कुछ ऐसे पद जो बचपन से मुझे प्रिय हैं ....

  • मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
    जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
    पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
    जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

  • धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
    खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
    वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
    काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।

  • कर कानन कुंडल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजती है
    मुरली कर में अधरा मुस्कानी तरंग महाछबि छाजती है
    रसखानी लखै तन पीतपटा सत दामिनी कि दुति लाजती है
    वह बाँसुरी की धुनी कानि परे कुलकानी हियो तजि भाजती है

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