शनिवार, 21 मार्च 2009

जनतन्त्र के सूर्योदय में

चुनाव का मौसम आ चला है और नेता टाइप लोग लोकतंत्र और जनतंत्र के बड़े बड़े नारे बुलंद कर रहे है और बातें बना रहे हैं। ऐसे ही विडंबना पूर्ण समय को श्रद्धासुमन चढाती हुई एक कविता अभी कल ही पढ़ी, कवि धूमिल के संग्रह संसद से सड़क तक में और कविता ने ऐसी चोट की किरात यही सोचते गुजरी कि सुबह इसे पोस्ट करना ही है.....तो पढ़ें...

जनतन्त्र के सूर्योदय में

रक्तपात –कहीं नहीं होगा
सिर्फ़, एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगेकाले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर
तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता मेंअब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है :
लेकिन तुम चुप रहोगे;
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी, तुम चुप रहोगे

या शायद, वापसी के लिए पहल करनेवाले –
आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी
अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम, चुपचाप, अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक परथरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार कर रही है।

धूमिल
(१९३६ में बनारस में जन्म और अल्पायु में ही १९७५ में देहावसान जब ये ३९ साल ही के थे। धूमिल को वास्तविक ख्याति और सम्मान मृत्यु के बाद मिला, इनके संग्रह कल सुनना मुझे के लिए निधन के ५ वर्ष बाद १९७९ में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, पर हाँ इनकी अमर पहचान बना यह संग्रह संसद से सड़क तक जो १९७१ में छाप गया था)

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