मंगलवार, 3 मार्च 2009

अँधेरे चारों तरफ़ .......

सुबह सुबह दफ्तर पहुँचते ही हलचल दिखी....समझ में आ गया कि कुछ हुआ है पर जब पता चला कि लाहौर में श्रीलंकाई टीम पर हमला हुआ है और कई खिलाडी घायल हुए हैं तो होश उड़ गए......जब आंखों के सामने से उसके विसुअल्स गुज़रे तो जैसे काटो तो खून ही नहीं....इस घटना का दुःख शायद क्रिकेट को ही नहीं बल्कि इंसानियत को भी लंबे वक़्त तक सालता रहेगा.....राहत इन्दौरी की एक ग़ज़ल याद आ गई जो कहती है,

अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे

राहत इन्दौरी

1 टिप्पणी:

  1. insani haivaniyat ka manzar bada khauphnak hota ja raha hai.ghar se nikalte hai jeet hasil karne, lekin lagata hai kahi zindgi hi na har jaye.sochate hai kya agali subah in aakho ko naseeb hogi?

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