बुधवार, 18 मार्च 2009

हो ना हो ........

एक नई दुल्हन मेरा मतलब है नई ग़ज़ल पेश ऐ खिदमत है.....

चल पड़ सफ़र पे, कोई तेरे साथ हो न हो
हंस दे तू खुल के, कोई हसीं बात हो न हो

ख़्वाबों में हर इक रोज़, मिलते रहना उससे तुम
क्या जाने हक़ीकत में, मुलाक़ात हो न हो

जिससे भी मिलो, खुल के मिलो, हंस के मिलो तुम
न जाने कल को फिर यही, जज़्बात हो न हो

चंद रोज़ तुम सुकूं से दिन गुज़ार लो
रोशन फिर ख़यालों की कायनात हो न हो

उलझो न सवालों में, जवाबों से बचो तुम
शायद हमेशा ऐसे ही हालात हों न हो

बस एक बार मुड़ के तुम न देखना मुझे
फिर ज़हन में तुम्हारे ख़यालात हो न हो

आ तो गए मयंक सियासत में एक दिन
बस देखना पहली ही शह में मात यो न हो

मयंक सक्सेना

3 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी
    आपकी कहन बहुत अच्छी लगी
    अभी हम गजल लिखना सीख रहे है इस लिए बहार निकलने में थोडा कच्चे हैं
    कृपया बहर भी लिख दिया करे तो आनंद दुगना हो जायेगा

    आपका वीनस केसरी

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  2. gazal achchi hai...khas kar jazbon ka bayaan mukammal ho raha hai lekin gazal ke shashtra ko aur samajhne ki zarurat hai ....lekin kaviraj mayank to waise hi nayee gazal aur vidroh ke paksh mein khade honge....waise mere mutaabik ye nazm hai .....

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  3. waah!pad ke tabiyat mast ho gayi.vakai zindagi ke har pal ko ji le kyuki bita huya lamha phir nahi aayega.vaise lekhni me aapka jawab nahi hai.

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