सोमवार, 30 मार्च 2009

दुनिया जिसे कहते हैं.....

कई महीने बाद एक बार फिर आपके लिए पुरानी डायरी के पीले पन्नों से कुछ हर्फ़ निकाल के लाया हूँ.....एक कविता जो छोटी है (मैं अक्सर बड़ी कवितायें लिखता हूँ) पर मुझे पसंद है, उस समय जब कॉलेज में थे...तब कैसा लगता था, क्या विचार थे उस को लिख डाला था....घर के बाहर की दुनिया बड़ी अजीब लगने लगी थी। अचानक से माहौल बदलने लगा था, अब समझ में आता है कि आज जो है...वो इसकी शुरुआत थी ! खैर आप कविता पढ़ें.....पीले पन्नों पर इसकी तारीख दर्ज है सोलह अक्टूबर, २००७......

दुनिया

आँखें
झपकती
खुलती-मुंदती,
बार बार
देखती हैं,
समझती हैं
कितना अबूझ, यह संसार !

फिर मुंदती हैं
और फिर देखती हैं
देखो जहाँ तक फैला है,
इसका विस्तार

फिर हंसती हैं आँखें
इसकी संपत्ति पर
हैरान हो
इसकी गति पर !
भयभीत हो
इसकी मति पर....

फिर फैल जाती हैं
सोचती हैं
दुनिया का
कितना नन्हा है आकार
दाई आँख के इस कोर
से शुरू
और
बायीं आँख के कोर पर.....

फिर विचलित हो
समझती हैं सारा व्यापार
जान जाती हैं
ये दुनिया है बाज़ार

फिर मुंद जाती है
और
गिरा देती हैं
कुछ बूँद
आंसू................

मयंक

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