सोमवार, 2 मार्च 2009

यह फागुनी हवा .........

मित्रों वसंत जा चुका है और फागुन का मौसम आ चुका है। फागुन के मौसम को बौराने का मौसम कहा जाता है,
मतलब बुढाऊ को चढी जवानी फागुन में
बूढा की कमर बनी कमानी फागुन में
मतलब मौसम ऐसा जो बदन ही नहीं दिल के भी पुराने दर्दों को जगह देता है। मौसम है इन दर्दों को सहलाने का और फिर जल्द ही होली भी हो ही लेगी.....तो पढ़ें फणीश्वर नाथ रेनू की एक कविता फागुन पर जो सारिका के 1 अप्रैल 1979 के अंक में प्रकाशित हुई थी ....मज़ा आएगा

यह फागुनी हवा

यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा
ले आई...ई...ई...ई
मेरे दर्द की दवा!

आंगन ऽ बोले कागा
पिछवाड़े कूकती कोयलिया
मुझे दिल से दुआ देती आई
कारी कोयलिया-या
मेरे दर्द की दवा
ले के आई-ई-दर्द की दवा!

वन-वन
गुन-गुन
बोले भौंरा
मेरे अंग-अंग झनन
बोले मृदंग मन--
मीठी मुरलिया!
यह फागुनी हवा
मेरे दर्द की दवा ले के आई
कारी कोयलिया!

अग-जग अंगड़ाई लेकर जागा
भागा भय-भरम का भूत
दूत नूतन युग का आया
गाता गीत नित्य नया
यह फागुनी हवा...!

फणीश्वर नाथ रेणु (रचना वर्ष १९५६)

3 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच फागुन के महीने में हर किसी का दिल जंवा हो उठता है।खेत लहलहा उठते है,फ़िजा रंगीन हो उठती है। बेहतरीन रचना है ऐसा लगा मानो फ़ागुन के मदमस्त बय़ार की तस्वीर आँखों के सामने घुमड़ रही हो। बहुत बढ़िया... सर...

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  2. फागुन ..... नाम लेते ही ऐसा मालूम होता है कि ऐसी बयार जिसमे बड़े सारे गुन हो. जो नए सपने दिखाती हो, जो फिजाओ की याद दिलाती हो, भवरे ताज़ा कलियों पर घुमड़ने लगते है, कई रंगों से मन सज उठता है, ये दिलो के मिलने का मौसम है, जो धर्म और जाति नहीं देखता, ये इंसानों को झूम उठने पर मजबूर कर देता है. ऐसा ही है हमारा फागुन.....

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