शुक्रवार, 27 मार्च 2009

सृजन का पर्व....नव त्राण की कल्पना

गुडी पडवा, उगादि या युगादि या कहें तो वर्ष प्रतिपदा....कुल जमा आज भारतीय पारंपरिक कैलेंडर या कहें तो पंचांग का पहला दिन है तो मतलब यह की आज नए वर्ष का पहला दिन है, पारंपरिक नव वर्ष का। वस्तुतः प्राचीन पंचांग (विक्रमी और शक दोनों) के अनुसार चैत्र मास की प्रतिपदा वर्ष का पहला दिन है, आज वही दिन है। पुरातन मान्यता यह है कि आज ही के दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की सरंचना का आरम्भ किया था सो नई सरंचना का पहला दिन है नव संवत्सर .......इसीलिए इस दिन से ही पंचांग या वर्ष की शुरुआत मान ली गई। तो भाई सबसे पहले आप सबको बधाई.....जैसा कि बच्चन जी एक जगह जल्दबाज़ीमें लिख गए,
वर्ष नव,हर्ष नव,
जीवन का उत्कर्ष नव।

नव उमंग,नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,

जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

पढ़ के लगा तो होगा कि जल्दबाज़ी में ही लिख गए पर अर्थ गहरे हैं, यह तो खैर महान रचनाकारों की खासियत है कि जब जल्दबाज़ी में लिखते हैं तो और भी अच्छा लिखते हैं (और जो ख़ुद की भी समझ में ना आए वह कालजयी हो जाता है :) ) फिलहाल विषय को आगे बढाते हैं नव संवत्सर बहुत महत्वपूर्ण तिथि है हालांकि वर्तमान युग में हमारी आधुनिक जीवन शैली रोमन कैलेंडर को ही प्राथमिकता देती है सो इसकी पूछ अधिक नहीं बची पर आपको बता दूँ कि शक संवत हमारे देश का राष्ट्रीय पंचांग है सो उस हिसाब से भी यह साल का पहला दिन ही है। इसे महारष्ट्र में शालिवाहन की दंतकथा से जोड़ कर विजय के पर्व गुडी पड़वा के रूप में मनाया जाता है तो कर्नाटका और आन्ध्र प्रदेश में उगादि के नाम से। उगादि दरअसल एक अपभ्रंश शब्द है जो संस्कृत के युगादि से प्राप्त किया गया है, युगादि यानी कि युग की शुरुआत जो सृष्टि की सरंचना की ही ओर इंगित करता है।
पर इसके अलावा भी इस तिथि की कुछ विशेषताएं हैं जो शायद हमें मालूम हो तो हम इसे केवल नव वर्ष के दिन के तौर पर नहीं देखेंगे। बहुत से लोगों को नहीं मालूम होगा पर हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के विरोध का साहस दिखलाने वाले स्वामी दयानंद ने संकीर्ण हिन्दू धर्म मत के ख़िलाफ़ जा कर आर्य समाज की स्थापना १८७५ में इसी दिन मुंबई में की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी दिन श्री राम का वनवास से लौटने के बाद राज्याभिषेक किया गया था। यही नहीं उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत भी इसी दिन से चालू किया था। इतिहास कहता है कि प्रख्यात गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से अपने प्रसिद्द पंचांग की गणना करनी शुरू की थी।
अक्सर इतिहास मुद्दों से भटकाने में अहम् भूमिका अदा करता है और ऐसा ही होगा अगर मैं वापिस मुद्दे पर नहीं आऊंगा तो, उदाहरण चाहिए तो हमारे नेताओं से मिलिए जो आज तक इतिहास से उबर नहीं पाये हैं; कभी ईश्वर की जन्मभूमि के नाम पर खून बहवा देते हैं तो कभी धर्मयुद्ध के नाम पर.....कुल जमा बवाल इतिहास का है जबकि हम यह भी नहीं जानते हैं कि वास्तविकता में हमारे इतिहास को लिखते वक़्त कितना खेल (Manipulation) हुआ है, जैसा कि मनु स्मृति की प्रतियाँ बनाते पर हुआ और कितनो को हमने वर्ण के आधार पर उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि इतिहास की बात करते करते मैं फिर भटक गया...देखा!
तो मुद्दा था पारंपरिक नव संवत्सर का.....देने आया था बधाई तो यह दिन मनाते हैं कि इस दिन सरंचना शुरू हुई थी....सृष्टि की सरंचना..........सृष्टि जो हमारे आस पास हमारे लिए है! प्रकृति जो वास्तविक देवता है, सृष्टि जो हमें वह सब देती है जो हमें चाहिए.....और फिर हम कह देते हैं कि अहं ब्रह्मास्मि ! अभी हाल ही में पापुआ न्यू गिनी द्वीप समूह पर वैज्ञानिकों ने ५० से भी अधिक नई जीव प्रजातियाँ ढूंढी हैं जो अब तक अज्ञात थी.....इस सुंदर सृष्टि के बारे में ना जाने कितने सच हमें पता तक नही पर हम परग्रहों को नापने निकल पड़े हैं। हम ख़ुद को ही नहीं जानते तो अन्तरिक्ष को छान डालने से क्या होगा? यह दर्शन नहीं है पर .....हम जिस तरह से तरक्की के नाम पर इस सुंदर सृष्टि का दोहन कर इसे बरबाद कर रहे हैं, हम कहीं ना कहीं इतनी महान सरंचना से निर्मम खिलवाड़ कर रहे हैं....हम सृष्टि का सर्जन नहीं कर सकते फिर किसने अधिकार दिया हमें विनाश का ...........
पर कौन समझाए मानव को जो ख़ुद मानव तक को नहीं बख्शता.....मज़हब और सोच की जिदों पर इंसानियत को बलि चढ़ा देता है उससे क्या उम्मीद की जाए पर आज नव संवत्सर के दिन आप सबसे अनुनय है कि कुछ सोचें कि सृजन ज़रूरी है कि अहं ........आज नया वर्ष शुरू हो रहा है, आइये प्रण लें कि नए साल में वाकई इंसान कहलाने लायक योग्यताएं हासिल करने की कोशिश करेंगे......
अंत में सोहन लाल द्विवेदी की कविता नव वर्ष

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!
एक बार फिर मंगलकामनायें ............

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