शनिवार, 17 अप्रैल 2010

भोला मन जाने अमर मेरी काया

जैसे ओस
तलाशती है दूब को,
जैसे धूप
तलाशती है झील को
जैसे सच
तलाशता है तर्क को
जैसे अघोरी
साधता है नर्क को
जैसे हमशक्ल
तलाशता है फर्क को
मैं तलाशता हूँ
अपना नाम और धाम
जिस नाम से तुम
मुझे जानते हो
जिस शक्ल से
पहचानते हो
वह नहीं हूँ मैं
फिर भी
भोला मन जाने अमर मेरी काया

आलोक तोमर
(रचनाकार वरिष्ठ पत्रकार, फिल्म और टेलीविज़न के पटकथा लेखक हैं....)

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