रविवार, 7 सितंबर 2008

आवाज़ .....

काफ़ी दिनों से इस कविता को पूरा करने के लिए परेशान था सो आज हो ही गई ...... ये हम सबकी हकीक़त है ..... सब जो सोचा करते हैं, तो पढ़ें ....

चुप रहो
तुम्हारी आवाज़
दूसरों के कानों तक न जाए
यही बेहतर है

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
सच बोले
जो दूसरों को हो नापसंद
तो कर लो इसे बंद

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
तुम्हारे पक्ष में हो
और उनको लगे अपने ख़िलाफ़
वो करेंगे नहीं माफ़

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
इतनी बुलंद हो
की उनके कानों के परदे फट जायें
फिर तुम्हारे साथी भी
तुमसे कट जाएँ

तुम्हारी आवाज़
दूसरी आवाजों से
अलग हुई तो
उन आवाजों को अच्छा नहीं लगेगा
वो
तब ?

तुम्हारी आवाज़ में सवाल हो सकते हैं
सवालों से बडों का
अपमान होता है
तुम्हारी आवाज़ में
अगर जवाब हुए
तो उनका हत मान होता है

तुम्हारी आवाज़
भले
तुमको मधुर लगे
पर उनको ये पसंद नहीं
इसलिए
या तो चुप रहो
या फिर
ज़ोर से चिल्लाओ
दुनिया को भूल जाओ
बंधन क्यूंकि
टूटने को उत्सुक है

3 टिप्‍पणियां:

  1. "या तो चुप रहो
    या फिर
    ज़ोर से चिल्लाओ"

    हम तो जोर से चिल्लायेंगे !!



    -- शास्त्री जे सी फिलिप

    -- हिन्दी चिट्ठाकारी के विकास के लिये जरूरी है कि हम सब अपनी टिप्पणियों से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें

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  2. सच में सबकी बात है. बहुत उम्दा रचना!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut achchi hai ......... lekin aapse geet ki bhi apeksha rakhta hoon.............ye prayog wadi aur nayi kavitaon ki shaily prabhavit to karti hai lekin dil mein seedhe nahi utarti.........

    kavi him

    उत्तर देंहटाएं

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