शनिवार, 1 मई 2010

क्यों न मजदूर दिवस का नाम बदल डालें.....


आज सुबह
वो गली बुहार गया
वरना शायद
पांव धरना भी मुश्किल था
रास्ते पर
जिसे वो निखार गया

आज दोपहर
वो खाने का डिब्बा
वक्त पर ही लाया
उसकी ज़रूरत का अहसास
भूख ने कराया

आज कड़ी धूप में
वो कहीं खुद को ही
रिक्शे पर लादे
खींचता होगा
कहीं
सर पर तसला रखे
मिट्टी उलीचता होगा

आज फिर उसने
कहीं किसी
निर्माण स्थल पर
जान गंवाई होगी
आज फिर उसने
किसी तरह रात की रोटी
कमाई होगी

आज भी वो
रेल की पटरियां
बिछा रहा होगा
सड़कों पर, दफ्तरों में...
जंगलों..पहाड़ों में...
कल कारखानों में
न जाने कहां कहां होगा...

फिर किसी रोज़ वो
किसी मेट्रो के
पुल के नीचे दब कर
या किसी कारखाने में
हवा में ज़हर घुल जाने से...
या फिर धूप में तड़प कर
या सर्दी लग जाने से
हो सकता है
वो दंगों में
हिंदू कह कर
या मुसलमान कह कर
जला दिया जाए...
या पुलिस थाने में
बुरी तरह पीट कर
जंगल में दफना दिया जाए....

कुछ भी हो ...
हर तरह से
उसकी किस्मत
बदलने वाली नहीं है...
उसकी नहीं कोई जगह
अब हमारे पास है...
अखबार के सिंगल कॉलम
और टीवी की मदहोशी में
वो बेहद उदास है...

और आज भी वो
सुबह निकला था
पेट के नाम पर...
हमेशा की तरह
काम पर...

मजदूर दिवस....
नाम से ही स्पष्ट है
जैसा
मान लिया है हमने
नियति को
वैसे का वैसा
साल के सारे दिन हमारे हैं
हम मजबूर नहीं हैं...
इसलिए मजदूर नहीं...
उसका सिर्फ़ एक दिन है...
वह बेहद मजबूर है
इसलिए वो मजदूर है....

आज अखबारों और टीवी चैनलों किसी ने भी यह ज़हमत नहीं उठाई कि उस तबके की बात करें जिसकी वजह से सब हैं...मार्क्स की दुहाई देने वाले मार्क्सवादी भी परिदृश्य से फाख्ता हैं....ब्लॉग की दुनिया को ज़रूर बधाई कि हम शायद इतना चेतन हैं कि याद रखते हैं उनको जिनसे हम सब हैं....टीवी चैनलों की तो खैर मैं बात करना भी बेमानी समझता हूं लेकिन अखबारों को क्या होता जा रहा है....ज़ाहिर है जब मेट्रो के खम्बे गिरने से या किसी ढोंगी सन्यासी के आश्रम में मजदूर मरेंगे तो हम शोर मचाएंगे...पर मई दिवस को भूल जाएंगे...मई दिवस को मजदूर दिवस कहना भी अपने आप में एक मानसिकता का ही परिचायक है....कि हम उनको अपने साथ खड़ा करने से परहेज़ करते हैं....क्यों न इसे निर्माण दिवस कहें...परिश्रम दिवस कहें....या साथी दिवस कहें....

और फिर आखिरी में अज्ञेय की एक छोटी कविता जो काफी कुछ कह देती है....

जो पुल बनाएंगे
वे अनिवार्यत:

पीछे रह जाएंगे।
सेनाएँ हो जाएंगी पार
मारे जाएंगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे
इतिहास में
बन्दर कहलाएंगे


मयंक सक्सेना


5 टिप्‍पणियां:

  1. आज कड़ी धूप में
    वो कहीं खुद को ही
    रिक्शे पर लादे
    खींचता होगा
    कहीं
    सर पर तसला रखे
    मिट्टी उलीचता होगा

    nice post

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  2. आज हमारे समाज में ग़रीबों और बेसहारों के प्रति जो शोषण की मानसिकता बनी हुई है इसका बहिष्कार होना चाहिए यदि समाज का कोई एक वर्ग आर्थिक एवं सामाजिक रूम में सम्पन्न है तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वह निर्धनों और कमज़ोरों का ख़ून चूसने लगें।

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  3. साल के सारे दिन हमारे हैं
    हम मजबूर नहीं हैं...
    इसलिए मजदूर नहीं...
    उसका सिर्फ़ एक दिन है...
    वह बेहद मजबूर है
    इसलिए वो मजदूर है....
    Samajh me nahi aa raha ki kya kahun?

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  4. ye kavita waakai shandaar hai,,,,saral, sahaj aur mudde par shaandaar chot karti hui..bina kisi bauddhik labaade ke...mujhe to aisi hi kavitaaein pasand hain...aap ise mera agyaan kah sakte hain..lekin ye kavita bahut shaandaar hai aur sabse badi baat "kavita" hai...

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