सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

अंधेरों का सफर .....

अक्सर सफर में लंबे अंधेरे होते हैं और रौशनी दूर तक नहीं दिखती ......कई बार दर्द होता है और दवा भी ख़ुद ही को करनी होती है। कई बार अपने सवालों के लिए अपने आप से ही जवाब माँगना होता है......कई बार नाउम्मीद होने पर ख़ुद ही उम्मीद की सड़क खोजनी होती है। यह हम सबके साथ होता है और ऐसे में ही ऐसी कुछ नज्में और गज़लें निकलती हैं ....
अंधेरों का सफर .....
दीवारों से टकराता रस्ता ढूंढता हूं
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

दीवारों पर लिखी इबारतों का मतलब
साथ खड़े अंधेरों से पूछता हूं

टटोलता खुद के वजूद को
अपने ही ज़ेहन में मुसल्सल गूंजता हूं

बार बार लड़ अंधेरे में दीवारों से
बिखरता हूं, कई बार टूटता हूं

अकड़ता हूं, लड़ता हूं, गरजता हूं
अंधेरे में, अंधेरे को घूरता हूं

अहसास है रोशनी की कीमत का
दियों की लौ चूमता हूं

हर तीन दीवारों के साथ
खड़ा है दरवाज़ा एक
बस इसी उम्मीद के सहारे
अक्सर अंधेरों में घूमता हूं

3 टिप्‍पणियां:

  1. हर तीन दीवारों के साथ
    खड़ा है दरवाज़ा एक
    बस इसी उम्मीद के सहारे

    बस यही उम्मीद आगे बढाये रखती है ..सुंदर लिखा है आपने

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  2. बहुत सुंदर रचना...महा शिव रात्रि की बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं..

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