शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की...



नैतिकता के नामर्द सिपाहियों को गौर से देख लीजिए
चलती सड़क, देश के "व्यस्त शहरों" में से एक, आस पास मौजूद पढ़े लिखे ज़िम्मेदार "नौजवानों की फौज" और फ़िर भी नोच फेंके गए उसके शर्म, लज्जा और लिहाज के गहने. वही गहने जो उसकी माँ ने पैदा होते ही तन पर पहले कपडे के साथ उसे पहना दिए. और आज उसके कपड़ों और गहनों के साथ-साथ उतर गया उसकी आँखों पर पड़ा वो चश्मा जिससे वो देखती थी हर पुरुष को अपने रक्षक के रूप में. वो चीख रही थी कि "मेरी इज्ज़त ख़राब मत करो, तुम्हारे घर में भी बहन है" लेकिन उसके वो "ज़िम्मेदार रक्षक" बन गए थे “नैतिकता के कर्णधार”, जो उसे सज़ा दे रहे थे उसके "अनैतिक कर्मों" की.

चिंता मत कीजिये मैं आपको नहीं याद दिलाउंगी वो सारी ऐसी घटनाएं जो इस वाकये से पहले भी न जाने कितनी बार दोहराई जा चुकी हैं, क्यूंकि जब आप वो सब भूल ही चुके हैं तो ये घटना भी आपके मस्तिष्क में ज्यादा दिन के लिए नहीं टिकने वाली. बदलते समाचार चैनलों की रफ़्तार टिकी हुई थी के कौन सा चैनल दिखा रहा था वो विडियो. अजी ग़लत मत समझिएगा दरअसल हम तो जानने की कोशिश कर रहे हैं के असल में हुआ क्या था, क्यूंकि बिना सब कुछ जाने हम कैसे कह दें के उन "नैतिकता के कर्णधारों" ने कुछ ग़लत किया. हो सकता है गलती उस लड़की की रही हो.
अरे माना के भारतीय समाज पुरुष-प्रधान समाज है लेकिन उसका भी तो ठोस कारण है, अब आप भी जानते ही हैं के पुरुष ज्यादा मज़बूत होते हैं, वही तो हैं जो इन अबलाओं की, कभी भाई, कभी पिता, कभी पुत्र और परिवार के मुखिया के तौर पर, रक्षा करता है. ये तो इन औरतों की आदत है, कुछ ज़रा सी बात हुई नहीं के रोना, चीखना, चिल्लाना शुरू. ये तो, ये भी नहीं समझती कि इनके हाथ में परिवार की इज्ज़त है, इनका बस चले तो सारे खानदान की नाक कटवा कर रखे दें. अब आप ही बताइए ऐसी औरतों के हाथों में सारे निर्णय छोड़ हम क्या घर संभालना शुरू कर दें?? अजी पूरी सृष्टि उथल-पुथल हो जाएगी!!

वैसे आपमें से कई लोगों ने उस पूरे हादसे की विडियो फुटेज न जाने कितनी मर्तबा देखी होगी, क्या एक पल को भी आपको ये ख्याल आया, के क्या होता अगर उस लड़की की जगह आपकी अपनी बहन, बेटी, पत्नी या घर की कोई भी स्त्री होती? क्या तब भी आप सिर्फ उस विडियो फुटेज को बार बार रिफ्रेश करके देखते? अरे कोई बात नहीं, मैं जानती हूँ के आपके पास मेरे इस सवाल का जवाब है ही नहीं, क्यूंकि दुर्भाग्यवश अगर वो आपके घर की कोई महिला होती तो इस समय आप इस लेख को पढने की हालत में ही न होते, और अब जब आप पढ़ ही रहे हैं तो दिमाग के किसी कोने में यही रट रहे होंगे कि क्या ज़रूरत थी उस लड़की को किसी पब में जाने की और वो भी देर रात, उसको तो उसके कर्मों की सज़ा मिल ही गई, हमारे घर कि औरतें तो कभी ऐसा न करें और अगर करें तो बागपत के उस गाँव की तरह हमारे घर पर भी बैठेगी एक खाप, और बन जायेंगे उनके आचरण के लिए नियम और कानून.

अगर आप ये सोच रहे हैं के मैं किस पक्ष की ओर से लिख रही हूँ तो कृपया इस लेख को यहीं पढ़ना बंद कर दें क्यूंकि अगर आप अभी तक समझ नहीं पाए तो कहीं न कहीं मुझे आपसे भी घृणा होगी. बचपन से आज तक पुरुषों के इस आचरण से मुझे घोर आपत्ति रही है, मौका मिला नहीं के किसी भी महिला की शारीरिक संरचना को भंग करने से नहीं चूकते, चाहे बात उन हाथों की हो जो बस मौका तलाशते हैं उस घृणा की भावना को प्रगाड़ करने की, या वो नज़रें जो मानो एक निगाह में ही आपका मानसिक बालात्कार कर दे. जो महिलाएं इस लेख को पढ़ रही हैं वो समझ सकती हैं के मेरा इशारा किस ओर है, और पुरुषों से बेहतर तो मेरी इस बात को कोई समझ ही नहीं सकता, आख़िरकार "मज़ा पाने" वाली तरफ तो आप या आप ही के साथी मौजूद होते है. कहने को घर के मुखिया एक महिला के बगैर अपने जीवन और परिवार की कल्पना तक न कर सकने वाले वो सब पुरुष भूल जाते हैं की चाहे वो पुरुष हो या महिला सबके जीवन का पहला पायदान एक ही था, बस एक गुणसूत्र की फेरबदल ने आपका लिंग निर्धारित कर दिया और हो गए आप "महाराजा"!!

मेरी हिम्मत नहीं हुई उस विडियो को दोबारा देखने की, क्यूंकि एक बार में उसने मुझे इस हद्द तक कचोट दिया के अगर दोबारा देख लेती तो रात के इस पहर सड़कों पर तमाम पुरुषों को गालियाँ देते हुए अकेले ही एक मोर्चे पर निकल पड़ती और यकीन मानिए अगर आप इस सोच में हैं के मेरा हश्र भी वैसा हो सकता है तो अब समय आ गया है के खुल कर दो-दो हाथ हो ही जाएँ. अभद्र भाषा और अश्लील आचरण पर अपना एक छत्र राज समझने वाले ये न भूलें के उन्हें उनके पैरों से घुटनों पर लाने के लिए मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, एक बात की जगह एक लात ही काफी होगी. लद गए शब्दों, उपदेशों, वाद-विवाद, और जिरह के दिन, बस एक बात दिमाग में बिठा लीजिये के "लातों के भूत बातों से नहीं मानते".

मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से त्रस्त ज़्यादातर महिलाएं समझौतों पर टिकी ज़िन्दगी जीती हैं, फ़िर तमाम उम्र पहले ख़ुद और बाद में अपनी बेटियों को उस आग में झोंक देती है. इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लगभग सभी प्रमुख समाचार चैनलों ने दिखाया, मैं बस इतना जानना चाहूंगी के कब तक आपके सरोकार सिर्फ खबर को दिखाने तक सिमट कर रहेंगे? मानवाधिकार आयोग कब तक केवल चीखता चिल्लाता रहेगा? वो पुलिस जो अभी भी आँखें, कान और मूंह बंद करके बैठी है, कब भूलेगी की गाँधी जी का समय बीत चूका है? और तो और आप लोग जो शायद इस लेख को इसकी आखिरी पंक्ति तक पढ़ें, आपकी आत्मा कब जागेगी???

















इला जोशी 
(लेखिका एक मल्टीनेशनल में बिज़नेस मैनेजमेंट प्रोफेश्नल हैं और स्वतंत्र लेखन और कविता करती हैं)

5 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपकी बातों से सहमत हूं .. आपने जो कुछ भी लिखा.. वो कई सवाल मुझसे भी पूछ रहा हैं.. मैं वादा करता हूं दी कि अब से चाहें छोटी से छोटी बात क्यो ना हो मै विरोध करूंगा.. और सौ नंबर पर फोन घुमा कर किसी के आने की प्रतिक्षा नही .. मैं खुद स्वंम विरोध करूंगा..

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  2. सही कहा आपने लातों के भूत बातों से नहीं मानते.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. मरी आत्माऎं जागती नहीं है !

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  5. काम गंदे सोंच घटिया
    कृत्य सब शैतान के ,
    क्या बनाया ,सोंच के
    इंसान को भगवान् ने
    फिर भी चेहरे पर कोई, आती नहीं शर्मिंदगी !
    क्योंकि अपने आपको, हम मानते इंसान हैं !

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