मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

अलविदा .... !

आज एक ऐसी नज़्म लाया हूँ जो मेरे दिल के बहुत करीब है.....यह नज़्म लखनऊ छोड़ने से पहले लिखी गई थी...उस समय हर नवयुवक की तरह अपने शहर में बहुत कमियाँ और बदहाली दिखती थी....ऐसा नहीं था की लखनऊ पर नाज़ नहीं था पर लगता की यहाँ कुछ होना नहीं है...यहाँ कोई अपनी कीमत नहीं जानता...कब यह शहर छूटे और ये लोग कीमत हमारी जान पाएं....दुःख, गुस्से और निराशा की स्थिति में यह नज़्म लिखी थी और कुछ ही दिन बाद लखनऊ छूट गया और आज ३ साल होने को हैं और लखनऊ से दूर हैं....बहुत याद आता है शहर ऐ लखनऊ ! अभी पुरानी डायरी के ही पन्ने पलट रहा हूँ तो यह नज़्म सामने पड़ी है......लखनऊ को छोड़ने के पहले लिखी गई यह नज़्म, अब हमारे लखनऊ से छूट जाने का दस्तावेज बन गई है !

अलविदा लखनऊ !

इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
सुबह न चमकेगी ऐसे
सांझ न दमकेगी ऐसे
और सहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

ना तराने होंगे मेरे
ना फ़साने होंगे मेरे
देर से आने पे अब ना
वो बहाने होंगे मेरे

और नज़र को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

घर लगेगा एक पिंजर
लोग अनजाने लगेंगे
रास्ते सुनसान होंगे
महल वीराने लगेंगे

इस नगर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

खिलखिला भी ना सकोगे
मुस्कराहट जाएगी गुम
जान जाओगे उसी दिन
मेरे होने की तलब तुम

हर पहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

सोच लो कि कल से आख़िर
किस से तुम रूठा करोगे
जानता हूँ आज इतराते हो
कल आहें भरोगे

जब बसर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

आंख में बस होंगे आंसू
होंठ पर फरियाद होगी
जिस तरफ़ देखोगे मुड़कर
सिर्फ़ मेरी याद होगी

और सफर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा
इस शहर को कर के तनहा, एक दिन मैं जाऊँगा

यह नज़्म लिखते पर यह नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी लखनऊ से इतनी दूर हो जायेंगे, ज़ाहिर सी बात जिनको अपने वजूद और कीमत का एहसास दिलाना चाहता था उनको तो इस दूरी से यह एहसास हुआ ही है....पर ख़ुद को भी वही एहसास हुआ है जो उनके लिए सोचा था .....आज अच्छी जगह से तालीम ले कर अच्छी जगह नौकरी कर रहे है.....बड़े चैनल में....काम है, नाम है.....पैसा भी आ ही रहा है....पर अगर कुछ नहीं हैं तो वो है लखनऊ !
और लखनऊ केवल लखनऊ नहीं है....क्या है...ये केवल लखनऊ वाले जानते हैं !
अभी के लिए खुदा हाफिज़ !

2 टिप्‍पणियां:

  1. kyo eisa likhta hai ki rona a jae
    15 minut chup raha kuch bi kam na kiya gaya. ek ek kar ke vo sare di aankho ke samne ghoomte gaye.
    vo class ,college library, election, palika bazar kitna kuch tha vaha pe par ab sab yade hi hain.
    Tune kavita me kah diya par mere dil me hi daba hai sab

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