शुक्रवार, 11 मार्च 2011

जश्न जारी है...

ज़ाहिर है मेरी लम्बे वक़्त बाद आ रही इस पोस्ट से कम से कम हिमांशु ज़रूर खुश होंगे....क्योंकि अर्से बाद कुछ ब्लॉग पर आया है और वो भी एक ग़ज़ल...पर दरअसल इस ग़ज़ल के दो शेर करीब एक-डेढ़ साल से किसी डायरी के पन्ने पर थे...आज पूरे कर डाले....तो उम्मीद करते हैं कि लिखने का ये जश्न जारी रहेगा...

तमाम मातमों पर, इक उम्मीद भारी है
बची है रात, और अपना जश्न जारी है

झुकी जो पलक तेरी, एक अश्क टप से गिरा
मेरी हथेलियों में, क़ायनात सारी है

ज़मीं भी फ़तह की है, आसमान भी जीता
कि दिल की जंग ही, हम ने ऐ दोस्त हारी है

तमाम ओर चरागों ने मुंह छुपाया क्यों
कि तेरे रुख से, चरागों की पर्दादारी है

मैं तुझको रोकता कैसे, मैं चाहता भी अगर
तेरी मर्ज़ी पे मैंने, खुशियां अपनी वारी है

मैं खिलखिला के हंसा, आंख मेरी भर आई
ज़रूर दर्द की, खुशियों से नातेदारी है

'मयंक' जानते हैं, तू न आएगा अब फिर
मगर जो नाम लिया, फिर से बेक़रारी है
मयंक सक्सेना

9 टिप्‍पणियां:

  1. bahut dinon baad aapki post aayi hai.... mera zikra karne ka shukriya...main wakai khush ho haya padhke..

    मैं खिलखिला के हंसा, आंख मेरी भर आई
    ज़रूर दर्द की, खुशियों से नातेदारी है

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  2. jo mil gaye aap, to dard kum hua
    apki hi to karamaat saari hai....

    bahut dino baad...wakai dum khum baaki hai mere dost.....

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  3. ज़मीं भी फ़तह की है, आसमान भी जीता
    कि दिल की जंग ही, हम ने ऐ दोस्त हारी है

    तमाम ओर चरागों ने मुंह छुपाया क्यों
    कि तेरे रुख से, चरागों की पर्दादारी है
    Nihayat sundar! Kin,kin panktiyon kee taareef kee jaye? Harek manbhavan hai!

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  4. बढ़िया ग़ज़ल है हम भी खुश हुए...सिर्फ हिमांशु नहीं...

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  5. बहुत ही उम्दा गजल भैया पढ़ के मजा आ गया..गजल की हर लाइन सीधे दिल में उतरती चली गई..
    मैं तुझको रोकता कैसे, मैं चाहता भी अगर
    तेरी मर्ज़ी पे मैंने, खुशियां अपनी वारी है..

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  6. खुबसुरत गजल। हरेक शेर दिल को छुती है। आभार।

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  7. तमाम मातमों पर, इक उम्मीद भारी है
    बची है रात, और अपना जश्न जारी है

    bahut khoob, tamaam maatamon par ek ummid bhari hai. bus itna hi kahungi

    Shama e ummid jalaye rakhna, Is junoon ke aage to puri kaaynat haari hai.

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  8. क्या बात है ! दिल खुश कर दिया मयंक

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  9. man gaye sir,
    kya gajal likhi hai apne.
    झुकी जो पलक तेरी, एक अश्क टप से गिरा
    मेरी हथेलियों में, क़ायनात सारी है.....
    mujhe yah line bahut bahut pasand aayi.

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