गुरुवार, 24 मार्च 2011

काल तुझसे होड़ है मेरी...(आलोक तोमर की अंतिम कविता)

तात को गए आज चार दिन हो गए....सबने उनके लिए खूब लिखा...सब उस जीवट को सलाम करते रहे जो केवल आलोक तौमर की ही बपौती था...सब उनके साथ वक्त को याद करते रहे...सबने कहा कि वो आदमी हमेशा साहसी रहा....लड़ता रहा....और मौत से भी लड़ता रहा....पिछली कविता मेरी थी, जो तात को समर्पित थी....आज ये वो कविता है जो तात ने लिखी थी...दुनिया छोड़ने से कुछ दिन पहले...इसे पढ़कर उनके न केवल अद्भुत लेखन बल्कि उनकी हिम्मत और जिजीविषा का भी अंदाज़ होता है....काल तुझसे होड़ है मेरी.....


"तात (आलोक तोमर) की हस्तलिपि में ये कविता "



काल तुझसे होड़ है मेरी...

काल तुझसे होड़ है मेरी
जानता हूं चल रही है
मेरी तुम्हारी दौड़
मेरे जन्म से ही
मेरे हर मंगल गान में
तुमने रखा है ध्यान में
एक स्वर लहरी,
शोक की रह जाए
आपके दूत मुझसे मिलें हर मोड़ पर
और जीवन का बड़ा सच
चोट दें, कह जाएं
सारे स्वप्न, सारी कामनाएं, आसक्तियां
तुम्हारे काल जल में बह जाएं
लेकिन अनाड़ी भी हूं
अनूठा भी, किंतु
तुम्हारी चाल से रूठा भी
काल की शतरंज से कभी जुड़ा
और एक पल टूटा भी
तुम सृष्टि के पीछे लगाते दौड़
देते शाप और वरदान
और प्रभंजन, अप्रतिहत
चल रही है
दौड़ तुमसे मेरी
ए अहेरी
काल, तुझसे होड़ है मेरी.....

आलोक तोमर

3 टिप्‍पणियां:

  1. zindgi ka sabse bada sach... joki Alok ji ne apne hi style main bataya...

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  2. ye sach to sab jante h k ek din ham sab ko jana hi h par shayad apne jeeven kal me log jan k v anjan bante h...

    उत्तर देंहटाएं
  3. ye sach to sab jante h k ek din ham sab ko jana hi h par shayad apne jeeven kal me log jan k v anjan bante h...

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