मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

तेरे जाने के बाद-3




हाल ही में हिमांशु ने कविताओं की श्रृंखला सी शुरु की....दो हिस्से लिखे...तेरे जाने के बाद....शीर्षक से......दोनो ही बेहतरीन....आज अचानक उसके आगे कुछ लिखने का विचार आया....सो उसी श्रृंखला में एक कड़ी और जोड़ रहा हूं...और हिमांशु का आभारी हूं....कई दिन बाद लिखवाने के लिए.....हिमांशु की रचनाओं का लिंक है....


तेरे जाने के बाद
कुछ दिन तक
हवाओं ने तड़पाया
दिशाओं ने उलझाया
नींद आई
तो तेरे ख्वाब ने जगाया
सोच ने
बस तुझको ही पाया

लेकिन अब
हवाएं
एक सी ही लगती हैं
दिशाएं
भ्रम नहीं देती हैं
नींद
अब तेरे ख्वाबों के बिन है
सोच
अब बोझ नहीं लेती है

तेरे जाने के बाद
कलम
जो उदास थी
अब फिर चल पड़ी है
कागज़
जो कोरे थे
फिर कारे हो रहे हैं

और इन पर
अब प्रेम के गीत नहीं हैं
न ही
विरह के आंसुओं से
ये भीग रहे हैं

अब
फिर से
ये
भूख की आवाज़ बनेंगे
फिर
ये विप्लव का साज़ बनेंगे
अब इन पर
श्रृंगार तो होगा
सुहाग का रंग
सुर्ख तो होगा
पर वो खून की सुर्खी होगी
अधरों की नहीं....
अब कविता फिर बहेगी
पर
अल्हड़ धार सी नहीं
चक्रवात की मार सी होगी

प्रेम के इस संसार में
मैं भूला था
कि बाहर एक दुनिया
और भी है
और
मैं नहीं था
होकर भी
इस संसार में

लेकिन
तेरे जाने के बाद
जो तंद्रा टूटी है
जो खुली हैं आंखें....

तो अब दिख रहे हैं
नंगे जिस्म...
भूखे लोग.....
बिलखते बच्चे......
चिढ़ा रहे हैं
वहशी आंखें...
चालाक लोग....
बेरहम दिल....
और
तेरे जाने के बाद
लगता है
कि
तेरा जाना अच्छा ही है
क्योंकि अब
मैं देख सकता हूं ये सब....

3 टिप्‍पणियां:

  1. lagta hai usi seereez ko aage badhaati hui kavita...lekin meri kavitaaon ka patra itni jaldi vidroh ke mode mein aata nahi dikhta...yahan aap ek do kadam jaldi badh gaye hain...beech ke fillers main dunga jald...uske baad is kavita ka taartamya badh jaayega....

    shrinkhla ko aage badhaane ke liye shukriya....

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  2. चाहे कितनी ही ठो क्यों हों पर आपने जो भी लिखा है खुदा की कसम गजबै लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं

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