बुधवार, 22 अप्रैल 2009

धूमिल की एक और कविता ...प्रजातंत्र

वे घर की दीवारों पर
नारे लिख रहे थे
मैंने अपनी दीवारें जेब में रख लीं

उन्होंने मेरी पीठ पर
नारा लिख दिया
मैंने अपनी पीठ कुर्सी को दे दी

और अब पेट की बारी थी
मै खूश था कि मुझे
मंदाग्नि की बीमारी थी और
यह पेट है
मैने उसे सहलाया

मेरा पेट
समाजवाद की भेंट है
और अपने विरोधियों से कहला भेजा
वे आएं-
और साहस है तो लिखें,
मै तैयार हूं

धूमिल
न मैं पेट हूं न दीवार हूं न पीठ हूं अब मै विचार हूं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आभार धूमिल की इस गहरी रचना को पढ़वाने का.

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  2. बहुत बढिया रचना है बधाई स्वीकारें।

    मेरा पेट
    समाजवाद की भेंट है
    और अपने विरोधियों से कहला भेजा
    वे आएं-
    और साहस है तो लिखें,
    मै तैयार हूं

    उत्तर देंहटाएं
  3. अब मैं विचार युक्त हूँ
    इसीलिये अब मैं मुक्त हूँ

    उत्तर देंहटाएं

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