रविवार, 5 अप्रैल 2009

एक रात का मेहमान....पुचकू..!

वो एक रात अचानक मिला था और सुबह अचानक ही हमें छोड़कर चला गया था.....मेहमान था एक रात का....रात भर खूब मज़ा उठाया उसने मेहमाननवाजी का और फिर सुबह जब हम उसे जगाने गए तो....
कहानी बहुत लम्बी नहीं है और ना ही बहुत रोचक पर हाँ बताती ज़रूर है कि इंसान कैसा भी हो, कोई भी हो ....उसकी फितरत हमेशा इंसानी ही रहती है और इंसानी फितरत ही है दरअसल प्यार करने की ....टूट कर प्यार करने की !
एक दिन अचानक बहन जी का फ़ोन आया (बहन जी मतलब देविका...उम्र में छोटी है पर उसके हर आदेश का पालन करता हूँ सो बहन जी कहता हूँ) की आज मन्दिर चलना है, अब हम तो वैसे ही भगवान् के दर ज्यादा नहीं जाते (क्यूंकि अगर वो है तो सब जगह है, नहीं है तो कहीं नहीं) सो अरसा हुआ था मन्दिर गए तो हमने हां कर दी और साथ ही हिमांशु भी तैयार हो गया। शाम को खाली होते ही चल दिए हम सेक्टर १९ के भव्य मन्दिर की ओर (नॉएडा में ऐसा मन्दिर भव्य ही कहलाता है), नियमों को ठेंगा दिखाते हुए हम एक बाइक पर तीन लोग सवार हुए और किसी चौथे की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी पर शायद चौथे को आना ही था और इसका अंदाजा हमें नहीं था।
मन्दिर में जाकर सभी मूरतों के माथा टेक कर हम जब बाहर निकले तो काफ़ी वक़्त एक छोटी बच्ची के साथ मैं और देविका फुटबाल खेलते रहे और फिर हिमांशु का परेशान चेहरा देखकर ही चलने को तैयार हुए (हिमांशु आदतन अधीर हैं) बाहर जूते लेने जब स्वयंसेवियों के पास पहुंचे तो देखा कि एक छोटा सा खरगोश का बच्चा उनके पास एक पिंजरे में खेल रहा है.....तभी मेरा हाथ अपनी पतलून की जेब में गया और पाया कि गाड़ी की चाबी गायब है, तुंरत भाग कर अन्दर गया और पूरा मन्दिर खोज डाला पर चाबी नहीं मिली ....लौट कर आया तो पता चला कि चाबी हेलमेट में ही पड़ी रह गई थी पर चाबियों के साथ ही एक और चीज़ मिली उन लोगों के हाथ में....जिसको देख कर चाबियाँ और घर सब भूल गया......स्वयंसेवकों के पास खेलता वो नन्हा खरगोश अब देविका के हाथ में था और उसके चेहरे पर वात्सल्य का वह आनंद देखते ही बन रहा था।
मैंने अचरज से जब पूछा कि यह कैसे तो जवाब पहले ही मिल गया कि "उन लोगों से मांग लिया", मैं इस प्रयास से आश्चर्यचकित था कि ममत्व जब उमड़ता है तो क्या नहीं कराता। खैर घर लौटते पर बाइक पर चार लोग हो चुके थे पर असुविधा का भाव गायब था। घर पहुँचते ही देविका सब कुछ भूल कर उस नन्हे प्राणी के साथ जुट गई और उसे प्यार से नाम दिया पुचकू .....पुचका बांगला में गोलगप्पे को कहते हैं, और प्यार से बात करने को पुचकारना भी कहा जाता है, तो कुल मिलाकर लड़कियों को जो चीज़ खाने में सबसे ज्यादा पसंद है उसको और प्यार को मिलाकर बन गया नाम पुचकू।
पुचकू रात ८ बजे से लेकर १२ बजे तक हमारे घर में इधर से उधर दौड़ता और खेलता रहा....फिर उसके बाद देविका के घर पर भी यही क्रम चला रात दो बजे तक। पहली बार ममता का अनुभव पहली बार माँ बननेसे कमतर नहीं होता यह पता चल रहा था। उसके खाने के लिए पालक खरीदी गई थी....उसे पार बार पकड़ कर अपनी नाक पर कटवाया जा रहा था, उसकी चूमा जा रहा था और सहलाया जा रहा था। पशु भी प्रेम के भाव और उसकी कीमत समझते हैं (शायद मनुष्य से ज्यादा) सो वह भी लगातार सकारात्मक उत्तर दे रहा था....उसकी आंखों में गज़ब की चमक थी.......और चैतन्यता भी
उसके फ़र जैसे कोमल बाल, उसकी चंचल आँखें, प्यारी सी नाक और उसका जवाबी प्रेम रात दो बजे तक दोनों (देविका और पुचकू) को जगाता रहा! सुबह उठकर सबसे पहले पुचकू का पिंजरा फिर से खोला गया उसे खिलाया गया.....दौडाया गया और नहलाया धुलाया गया.....(अच्छे बच्चे रोज़ नहाते हैं) उसके लिए विशेष तौर पर पानी गुनगुना किया गया और उसके बाद उसे दुबारा अपने पिंजरे में रखा गया। १ घंटे बाद जब तैया होकर बहनजी पुचकू से खेलने पहुँची तो वो उत्साह नहीं था....चमकती आँखें बिल्कुल उदास थी.....चंचलता और फुर्ती गायब थी.....कोई उत्सुकता नहीं जैसी रात को थी ! लगा कि अभी मूड नहीं है और निकला गया दफ्तर की ओर, सखी से कहकर कि इसका ध्यान रखने ...
शाम को घर पहुँचते ही ख़बर मिली कि पुचकू नहीं रहा......समझ ही में नहीं आया कि क्या कहा जाए, रात तक तो वह बिल्कुल स्वस्थ था....फिर किसी ने बताया कि वह था ही बीमार.... हालाँकि इस तरह के समाचार कई बार मिलते रहते हैं कि फलाना नहीं रहा पर इस बार अजीब सा लगा....चाय पीने जा रहा था मन नहीं हुआ लौट आया.....काम में भी मन नहीं लगा उस दिन समय से ही निकल लिया...देविका का भी मन अन्दर से तो ख़राब था ही पर हमेशा की तरह ऊपर से नहीं दिखा रही थी। घर पहुंचे तो पुचकू का पिंजरा दिखा वैसे ही कपड़े से ढंका हुआ, हिम्मत कर के पिंजरे पर से कपड़ा हटाया तो जो सूना था वही मिला, पुचकू नहीं रहा।
बच्चा जो इतनी देर से ख़ुद को संभाले हुई थी उसको पिंजरे से बाहर निकाल कर गोद में लेकर सहलाने लगी और फूट फूट कर रो पड़ी......मैंने भी रोका बहुत पर आंसू रुके नहीं। पर देविका को समझाना जो था पर वो तो गोद में मृत खरगोश को लिए रोये जा रही थी और क्या किया भी जा सकता था....रात भर कितनी योजनायें बनी होंगी...कि इसको ये खिलाएंगे, घर पर सबको बता दिया था.....लगा था कि अकेलेपन को कोई बांटेगा, पर एक ही रात में......खैर बड़ी मुश्किल से उससे पुचकू का शरीर लेकर उसे एक कपड़े में लपेटा और तय हुआ कि इसे हिंडन में बहा दिया जायेगा......रास्ते भर देविका रोती रही, हिंडन नदी में जैसे ही उसे प्रवाहित किया फिर उसकी रुलाई छूट पड़ी और अन्दर ही अन्दर मैं भी.......एक रात का मेहमान !
ये वृत्तान्त महज़ इसलिए नहीं कि कुछ लिखना था बल्कि इसलिए कि इंसान होने का क्या मतलब है और ममत्व केवल अपने बच्चों को ही प्यार करना नहीं है यह बात करने के लिए है। हम इंसान है और उसके बाद एक पशु से भी इतना प्यार कर लेते हैं कि उसका विछोह बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, भले ही उससे मिले कुछ ही वक़्त हुआ हो....वात्सल्य किसी भी स्त्री का मूलभूत गुण है और वह उसको बरसाती है बिना यह देखे कि वह उसका अपना बच्चा है या कोई और........हम एक पशु से भी प्यार कर लेते हैं और उस पर प्रेम की, नेह की, वात्सल्य की वर्षा कर देते हैं फिर हम इंसानों को प्यार क्यूँ नहीं कर पाते हैं......? क्यूँ हम एक दूसरे का ही खून बहा देते हैं.......
क्यों हम भेद करते हैं......क्या हम इंसान रहना चाहते हैं और क्या चाह कर भी हम अपनी मूलभूत प्रवृत्ति बदल सकते हैं ?
जवाब चाहिए.....क्यूंकि एक रात का मेहमान मुझे बहुत कुछ सिखा गया है !

4 टिप्‍पणियां:

  1. भावुक करने वाली घटना है... पशु-पक्षी भी इंसान से ज्यादा ही पारिवारिक होते हैं...

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  2. ज़ुबाँ सिखाती है भेद करना
    और बन जाती है पहचान
    इसीलिये बेज़ुबाँ सिखाते हैँ
    हमेँ बनना अब इंसान

    एक रात का मेहमान

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