मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

अच्छा अनुभव

भवानी भाई की एक कविता जो मुझे बेहद पसंद है....

मेरे बहुत पास
मृत्यु का सुवासदेह पर
उस का स्पर्श मधुर ही कहूँगा
उस का स्वर कानों में
भीतर

मगर प्राणों में
जीवन की लय तरंगित
और उद्दाम किनारों में
काम के बँधा प्रवाह नाम का
एक दृश्य सुबह का
एक दृश्य शाम का

दोनों में क्षितिज पर
सूरज की लाली दोनों में
धरती पर छाया घनी
और लम्बी इमारतों की
वृक्षों की देहों की काली
दोनों में कतारें पंछियों की
चुप और चहकती हुई दोनों में
राशीयाँ फूलों की
कम-ज्यादा महकती हुई
दोनों में

एक तरह की शान्ति
एक तरह का आवेग
आँखें बन्द प्राण खुले हुए
अस्पष्ट मगर धुले हुऐ
कितने आमन्त्रण
बाहर के भीतर के

कितने अदम्य इरादे
कितने उलझे कितने सादे
अच्छा अनुभव है मृत्यु
मानो हाहाकार नहीं है
कलरव है!

- भवानीप्रसाद मिश्र

4 टिप्‍पणियां:

  1. कितने अदम्य इरादे
    कितने उलझे कितने सादे
    अच्छा अनुभव है मृत्यु
    मानो हाहाकार नहीं है
    कलरव है!
    सुंदर रचना ... आभार।

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  2. bhawanee ji ka jara samman to karo pyare bhawanee bhai kah ker kya batana chahte ho pathkon ko?? tumhare dost yar hain kya

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  3. पण्डित भवानी प्रसाद जी की अनुपम रचना पढ़वाने का बहुत आभार भाई मयंक।
    आज आपसे कुछ बात करने का मन हुआ आपको अपना समझ कर तो चले आए।
    आपकी ‘समयचक्र’ पर मिश्राजी को की गई टिप्पणी हमें आप तक खेंच लाई। ज़रा मुलाहिजा फ़रमाइएगा-
    समीर जी को बधाई.....लिखते तो हैं ही वे खैर गजब का....
    महेंद्र जी अन्यथा न लें शायद तकनीकी समस्या है कुछ शब्द गलत छप गए हैं
    गरिमामय के स्थान पर गरिमामयी
    भूरी-भूरी के स्थान पर भूरि भूरि
    जलबे के स्थान पर जलवे होना चाहिए.....
    भाषा की शुद्धता ही भाषा को बचाएगी....
    क्षमा सहित
    आपका मयंक

    हाँ तो भाई मयंक यदि भाषा की शुद्धता ही भाषा को बचाएगी और आप लखनऊ से हैं तो फिर कुछ यूँ भी होना चाहिए ना आपकी इस टिप्पणी में ---
    खैर गजब के स्थान पर ख़ैर ग़ज़ब
    गलत के स्थान पर ग़लत
    हा हा !
    आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई मयंक भाई फिर मिलेंगे।

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  4. मन को ऐसी कविता भायेँ

    आप सुनायेँ सुनते जायेँ
    कितने उलझे कितने सादे
    जीवन करता रहता वादे

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