शनिवार, 13 जून 2009

कुछ यादें सिरहाने......

एक नया शहर ....जो पहली बार घर से निकलने की वजह से कुछ ज्यादा ही नया लग रहा था....अकेले सफर बहुत किया था पर कभी शायद ये नहीं सोचा था की लखनऊ से दूर कहीं रहना पड़ेगा....खैर भोपाल में आए ३-४ महीने बीत चुके थे और मैं या हम सब यह तो जान ही चुके थे कि कला और संस्कृति के मामले में भोपाल वाकई देश की कला राजधानी है....और सार्वजनिक प्रदर्शनों का गढ़ है....ऐसे में अपनी अपनी लखनवी जुबां के अलावा किसी चीज़ में बहुत ज्यादा गडबडी आती नहीं दिख रही थी....कई अच्छे दोस्त मिल गए थे पर मेरे विपरीत ज्यादातर कला के नाम पर भाग खड़े होते थे और यायावर फितरत का मैं अकेला ही भोपाल की सड़कें छानता रहता था....पहले से पता था कि मेरे दो पसंदीदा शख्स भोपाल के ही हैं....एक हबीब तनवीर और दूसरे बशीर बद्र...बशीर बद्र साहब से हालांकि आज तक मुलाक़ात नहीं हुई पर तनवीर जी से और किस्मत के मेल ने मिलवाया .....एक बार नहीं....तीन बार ....

एक सुबह अखबार में एक ख़बर से पता चला कि हबीब तनवीर शहर में हैं....उस वक़्त बहुत समपर्क ना थे और ना ही सम्बन्ध सो एक अंदाजा लगाया कि भारत भवन या रविन्द्र भवन में शायद दर्शन हो जायें....दर्शन से ज्यादा अपनी हैसियत नहीं लगती थी सो बस एक बार दूर से देखने का मन था कि आख़िर तस्वीरों में चिर युवा दिखने वाला ये शख्स क्या वाकई इतना युवा है....तो बस २ नंबर बस पकड़ कर पहुँच गए....रविन्द्र भवन....और वहाँ से घूमते हुए भारत भवन....और वाह री किस्मत दूर से ही किसी ने बताया कि वो रहे हबीब तनवीर....डरते हुए क़दमों से उनके पार पहुँचा....एक दुबला पतला सा वृद्ध बैठा कुछ लिख रहा था और आस पास बैठी थी तन्हाइयां ....

कुछ देर वहीं खड़ा रहा और फिर चुप्पी तोड़ कर बड़ी हिम्मत से बोला ....सर मेरा नाम मयंक सक्सेना है....लखनऊ का रहने वाला हूँ....आपसे मिलने आया हूँ....हड़बड़ी में बोले गए मेरे इस आखिरी वाक्य पर वे मुस्कुरा दिए और वैसे ही लिखते हुए हाथ से बैठ जाने का इशारा किया...मैं वहीं बैठ गया....५ मिनट बाद मुझसे मुखातिब हुए और बोले क्या नाम बताया ....?

मैंने दुबारा अपना पूरा परिचय दोहरा दिया ....फिर तुंरत एक दूसरा प्रश्न.....पत्रकार तो नहीं हो...?....जवाब दिया ...नहीं सर पढ़ाई कर रहा हूँ....आपसे मिलने की इच्छा थी....उधर से नहीं ठीक है....पत्रकार होते तो कहता कि अभी फुर्सत नहीं है.....और उसके बाद तमाम बातें....मेरी पढ़ाई से लेकर नाटक...अभिनय...संगीत और लोक कलाओं पर...सरकारों के रवैये पर....क्या क्या पढ़ते हो साहित्य में....ख़ुद क्या लिखते हो....अपने नाटकों पर बात...दूसरों के नाटकों पर बात.....तमाम बातें....और उनका पुराना पाइप....उनकी उँगलियों में....

काफ़ी देर बाद....अचानक उठ खड़े हुए और बोले....चलिए अब मेरे पास और वक़्त नहीं है तो ....और मैं सीधा इशारा समझ गया....और लौट चला घर के लिए....सोचते हुए कि इतना बड़ा व्यक्तित्व और इतना सरल व्यक्ति....उस दिन की मुलाक़ात हलाँकि जीवन की एक धरोहर थी पर ना जाने क्यूँ लग रहा था कि कुछ रह गया है जो अगली बार मिलने पर ही पूरा होगा....अगला मौका भी आया पर कुछ दिनों बाद....उस समय तक सूचना तंत्र थोड़ा मज़बूत हो गया था सो उनके आने की सूचना पहले ही मिल गई....इस बार जगह थी रविन्द्र भवन.....

इस बार उत्सुकता तो उतनी ही थी पर डर पिछली बार से कम...बल्कि नहीं के बराबर.....कई लोग थे ...जैसे तैसे उनसे मिला...देखते ही बोले...फिर आ गए...ऐसा लगा कि ज़रूर मुझसे चिद्ध गए हैं...पर फिर ठठा के हंस दिए और कहा आओ....इस बार तबियत थोडी ख़राब थी...मुझसे कहा कि तबियत ठीक नहीं है पर ज़िन्दगी ही थियेटर है तो किया भी क्या जाए....मैंने पता नहीं क्यों बिना सोचे पूछ लिया ...आपकी टोपी कहाँ है...इस बार मुझे लगा कि फिर गलती हुई पर वे मुस्कुराए...और बगल में रखी चिर परिचित टोपी उठा कर बोले ...इसकी बात कर रहे हो....और मैं भी हंस पडा...... इस बार ज्यादा बात नहीं हो पायी पर मैंने एक सवाल पूछा कि आपके बाद इस विरासत का क्या....ये लोक और आधुनिक कला का मेल कौन करेगा...तो एक आश्चर्यजनक उत्तर जिसमे चिंता का कोई नामोनिशान नहीं...कोई ना कोई कर लेगा....बोलकर फिर बोले ...मैंने भी तो किया ही.....कई लोग हैं जिनकी ज़िन्दगी में बस्ता है ये सब.....फिर थोडी सी फिल्मों पर बात हुई...और फिर कुछ प्रेस फोटोग्राफरों को देख कर मैंने कहा कि आपके साथ तस्वीर खिंचवाना चाहता हूँ....तो मना कर दिया और बोले कि ....तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो....जाओ ज़िन्दगी में बढ़िया करो....
उसके बाद एक बार मुलाक़ात हुई पर बहुत कम बात हुई ...उनकी तबियत वाकई ख़राब रहने लगी थी....उसके बाद समय बीत गया....भोपाल छूट गया....और अब ख़बर आई कि हबीब नहीं रहे.....सब उनको याद कर रहे हैं....कोई उनके नाटकों के लिए ..कोई कला के लिए तो कोई उनके ख़बर होने की वजह से...नई नौकरी की नई व्यस्ततताओं की वजह से कुछ समय नही लिखा पाया ...तुंरत नहीं लिख पाया ...पर मैं उनको याद कर रहा हूँ....उनसे अपनी छोटी छोटी तीन मुलाकातों के लिए.....और उस एक वाक्य के लिए.....
तस्वीर आंखों से उतारो..और दिमाग में सहेज लिया करो
और आज उनके ना होने पर भी कुछ तस्वीरें ताज़ा हैं...जो आंखों से उतारी गई थी....और कुछ यादें आज भी सिरहाने हैं....






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