शनिवार, 15 दिसंबर 2007

उम्मीद है कि ....

प्रसिद्ध कवि दुष्यंत की यह पंक्तिया हमे हमेशा प्रेरणा देती हैं और देती रहेंगी कि हमने जो रास्ता चुना है उस पर हमेशा चलते रहे ....... मैंने कई साल पहले दो पंक्तिया लिख डाली थी उनसे ही दुष्यंत कि इस कविता को शुरू करूँगा ........

चक्रवात में खोकर डूब गए तट सारे
पर ढूंढ ही लेगी लहर हमारी नए किनारे

अब देखें दुष्यंत को ,

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।

- दुष्यन्त कुमार

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