मंगलवार, 25 नवंबर 2008

जनानो की मर्दानगी ..... क्यों नहीं !






कल २५ नवम्बर था....हम में से कईयों को नही मालूम होगा सो बताये देता हूँ की कल के दिन को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव की समाप्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगर औपचारिक भाषा में कहें तो संयुक्त राष्ट्र के १७ दिसम्बर के एक प्रस्ताव को पारित करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने २५ नवम्बर को महिलाओं के उत्पीडन के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने का निर्णय लिया। यह तिथि १९६० में इसी दिन डोमिनिक गणराज्य के शासकों के आदेश पर तीन राजनीतिक कार्यकर्ता बहनों की नृशंस हत्या की याद में निर्णीत हुई। *(By resolution 54/134 of 17 December 1999, the General Assembly designated 25 November as the International Day for the Elimination of Violence against Women, and invited governments, international organizations and NGOs to organize activities designated to raise public awareness of the problem on that day. Women's activists have marked 25 November as a day against violence since 1981. This date came from the brutal assassination in 1960, of the three Mirabal sisters, political activists in the Dominican Republic, on orders of Dominican ruler Rafael Trujillo (1930-1961)।)



खैर इतिहास भूगोल तो किताबों की बात है पर व्यवहारिक बात यह है कि ध्वनी की रफ़्तार से भी तेज़ चलने वाली इस दुनिया में आज भी वर्णभेद और लिंगभेद जैसी व्यवस्थाएं और अहम् बोध बचे हुए हैं। इसके ख़िलाफ़ पुरूष तो शायद ही कभी एक मत हो पाएं ( हलाँकि मैं स्वयं पुरूष हूँ......शायद इसी नाते पुरूष अहम् को समझ सकता हूँ ) इसलिए अब महिलाओं की ज़िम्मेदारी है....स्वयं और अपने आस पास की और महिलाओं के प्रति कि ख़ुद लड़ने और विरोध करने को तैयार हो जायें कि आपकी जानकारी में कभी भी किसी भी स्त्री पर हिंसा या उत्पीडन ना होने पाये ( स्त्री पर हिंसा केवल पुरूष ही नहीं करते )मुझे कवि का नाम तो नहीं याद पर अक्सर यह पंक्तियाँ मुझे याद आती हैं,



कर पदाघात अब मिथ्या के मस्तक पर



सत्यान्वेषण के पथ पर निकालो नारी



तुम बहुत दिनों तक बनी दीप कुटिया की



अब बनो क्रान्ति की ज्वाला की चिंगारी


खैर क्रान्ति एक दिन में नही आती सो धैर्य बड़ी ताकत होगा.......सो लड़ेंऔर प्रतीक्षा करें जीतने तक, अंग्रेज़ी के प्रसिद्द कवि सर हेनरी वौटन ने कहा,

"Learn to labour and wait."

अभी फिलहाल एक छोटी कविता जो नारी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित है......तुंरत रची गई है सो काव्य सौष्ठव की अपेक्षा ना करें, भाव सौष्ठव देखें,


माँ अब तुम तैयार रहो

बनने के लिए पिता

यकीन करो

तुम उतनी ही जिम्मेदार हो


बहन अब तुम जान लो

हो सकता है रक्षा करनी पड़े

तुम्हे भाई की अपने

क्या तुम तैयार हो ?


गृहस्वामिनी क्या तुम्हे नहीं लगता

कि घर तुम्हारी क्षमताओं के आगे

छोटा पड़ गया है

क्यूँ ना अब सीमाएं तोड़ भागें

दुलारी बेटियों क्यूँ अब तुम्हे

सड़क के मोड़ पर बैठा

कोई दानव करेगा परेशान

उठाओ हाथों को उसे अहसास कराओ

तुम में भी है जान


छोड़ कर दायरों को

तोड़ बंधनों को

अपेक्षाओं से परे

सीमाओं से आगे

तुम्हारा आकाश खिड़की से दीखता

बादल का टुकडा नहीं

वो क्षितिज का कोना है

कोई दुस्वप्न या दुखडा नहीं


उनकी भाषा में उनको जवाब देना

अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है

उन्होंने बहुत मर्दानगी

अब जनानो की बारी है



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