सोमवार, 12 जनवरी 2009

बूँद

जिस दिन निर्णय लिया कि पत्रकारिता करनी है, यह नहीं सोचा था कि घर छोड़ना पड़ेगा....और जब पत्रकारिता की पढ़ाई की तो समझ आया कि घर से तो दूर जाना ही होगा। फिर एक नामचीन चैनल में नौकरी लगी तो घर के ड़े बोले कि जाओ भविष्य बनाओ और बूढे बोले कि नहीं परदेस जाने से अच्छा है कम पैसे में यहीं कोई नौकरी कर लो। ख़ुद के दिल में भी हमेशा लखनऊ से बिछड़ जाने की टीस उठती और उसे कम करने के लिए हर महीने लखनऊ का एक चक्कर लगाते हैं.....एक दिन रात को ऐसे ही ये सब सोचते सोचते और अपने घर, अपने शहर को याद करते करते अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की एक कविता जो शायद कक्षा ५ या छः में पढ़ी थी वो याद आ गई। आज वही कविता आपके लिए लाया हूँ....देखिये कि कितनी सुंदर कविता है और चालू और लोकप्रिय काव्य के शोर में किस तरह हम उन कवियों और कविताओं को भूलते जा रहे हैं

बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से

थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी

सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,

आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?


देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,

मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?

या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,

चू पडूँगी या कमल के फूल में ?


बह गयी उस काल एक ऐसी हवा

वह समुन्दर ओर आई अनमनी

एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला

वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।


लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते

जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर

किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें

बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।


अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

5 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी पसंदीदा कविता थी यह.....काफी दिनो से भूल ही गयी थी इसे....आभार याद दिलाने के लिए।

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  2. आपका बहुत-बहुत धन्यावाद इस कविता को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने के लिए...मुझे मेरे घर की याद आ रही है...वो खेत..वो हमारा स्कूल..वो आगन में भाईयों के साथ हुल्लड़बाजी...दादी की डांट..।। सोचा नही था कि कभी कि अपने घर से दूर..वो भी इतना दूर हो जाउगा..आपका आभार...एक फिर आभार

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  3. यह कविता पढ़ कर बहुत ही अच्छा लगा। और लेख भी बहुत ही बढ़िया था। ब्लाग का ले-आउट बढ़िया है।

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  4. वाह क्या बात हैं इतनी अच्छी कविता पढ्वा दी। शुक्रिया जी।

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  5. अब हम लोग आपको बूँद समझें या मोती हो गए हैं

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