बुधवार, 28 जनवरी 2009

सर्दियों का ना होना ...... दिमागी कुहरा !

सुबह उठा तो देखा धूप निकल आई है, घड़ी देखी तो आठ ही बजा था....रात ३ बजे सोया था सो थोडी सी देर से उठा पर आठ बजे धूप ? यकीं नहीं हुआ कि जनवरी अभी ख़त्म नहीं हुआ....पर सर्दी ख़त्म होने चली है। यकीं करने को जी नहीं चाहता कि इतनी जल्दी ये रूमानी मौसम जा रहा है पर परेशान करता स्वेटर कह रहा है कि यकीं कर लो क्यूंकि मैं पसीने से भीग रहा हूँ। दरअसल शुरुआत तो हुई सर्दी के जल्दी दिवंगत हो जाने के ख़याल से पर याद आ गए वो दिन......
वो दिन जब सितम्बर ख़त्म होने से पहले ही छत पर धूप में गर्म कपड़े और रजाइयां सूखने लगती, जब अक्टूबर की शुरुआत में ही मम्मी आधी बांह का स्वेटर ज़बरदस्ती पहना कर बाहर भेजती और चाय अदरक के स्वाद से लबरेज़ हो जाती। फिर आता दशहरा और तब से जो पटाखों की धूम शुरू होती वो मोहल्ले भर के डांटने के बाद भी करवाचौथ से लेकर दिवाली तक जारी रहती। अन्तर बस इतना रहता कि स्वेटर की बांह तब तक पूरी बांहों को घेर लेती।
कपड़े खरीदने और पहनने का भी अलग चाव जो शायद किसी और महीने में ना रहता.... रंग बिरंगे स्वेटर तरह तरह की टोपियाँ (मंकी कैप ना पहनने को लेकर घर में खूब झगडा) और हर बार नए दस्ताने। एक और कारण सर्दियों में पड़ने वाली ढेर सारी शादियाँ भी थी। एक अलग मज़ा आता था जब हलकी सर्दी में पहली बार कम्बल निकाले जाते थे और उनमें घुस कर नीचे से पैर थोड़े से निकाल कर उन पर लगती मद्धम ठण्ड का मज़ा लिया जाता था। फिर खुलती थी रजाइयां और आने लगता था मौसम मूंगफलियों का जो नमक और चटनी के साथ रजाई में ही पड़े पड़े टूंग ली जाती थी।
याद आ जाता है लखनऊ जहाँ बचपन जिया और जवानी के मज़े लिए। सर्दी आते ही रोज़ सुबह नाश्ते में छुंकी हुई हरी मटर या फिर मूली के परांठों की फरमाइशें, और इतवार को नाश्ते में साथ में गर्म जलेबियाँ। ज़बान पर पानी आ जाता है आज भी सोच कर जब सुबह सुबह चौक चौराहे पर मक्खन मलाई खाने जाते थे और रात को खाना खाने के बाद गर्मागर्म गाजर का हलवा।
नए साल पर दोस्तों और टीचरों को हाथ के बनाए ग्रीटिंग कार्ड देना और जनवरी आते ही पूरे शहर का घने कोहरे में डूब जाना। छुट्टियों का १५ दिन और बढ़ जाना और फिर घर पर बैठ कर अंगीठी पर हाथ सेंकना। अलाव या कोयले की आंच में भुने हुए आलू और शकरकंद ......दिन भर चाय के दौर पर दौर.......गजक, गुड की पट्टी, लैया के लड्डू, तिल के लड्डू और ना जाने क्या क्या .... सर्दी का वो एहसास जब हाथ सुन्न हो जाते थे और एक दूसरे के गालों पर लगा कर, एक दूसरे के स्नेह की ऊष्मा से भर जाते थे। छुट्टी के दिन दिन भर मैच खेलना और गेंद पकड़ने पर सर्दी में हाथ सुन्न हो जाने पर कहना "चिपक गई यार"
रजाई में मम्मी से लिपट कर सो जाना और सुबह उठने में दुनिया भर के नखरे......कई बार तो सर्दियों में बिना दांत साफ़ किए ही चाय पी लिया करते थे और फिर पापा की डांट भी खाते थे। स्कूटर पर पापा के पीछे चिपक कर बैठ जाना और आंखों में हवा लगने से निकलने वाले पानी को बार बार आस्तीन से पोछना......
आंखों से पानी आज भी बह रहा है पर गाड़ियों के धुंए से और अपनों की याद से। सर्दी शायद पिछले कुछ साल से देखी ही नहीं। तीन साल हुए लखनऊ छोडे हुए और शायद तभी से ना तो भुने आलूँ खाए ना ही शकरकंद। वो अदरक की चाय कभी कभी मिल जाती है उसमे वो स्वाद नहीं है, मूंगफली रजाई की जगह बस में बैठकर खाते हैं....लखनऊ में चौक की मक्खन मलाई इस साल केवल एक बार नसीब हुई वो भी घर में ही खाई चौक जाकर नहीं....गाजर का हलवा एक बार मम्मी ने किसी के हाथों भिजवा दिया और एक बार घर गया तो खाया। गर्म कपड़े खरीदने के लिए अब कोई उत्साह नहीं क्यूंकि ठण्ड ही नहीं.....रजाई में लिपटने के लिए अब मम्मी नहीं हैं...और स्कूटर पर चिपकाने के लिए पापा भी यहाँ नॉएडा में नहीं हैं.....घर से दूर.... गजक कोई लखनऊ से आता है तो ले आता है पर उसे भी सम्भाल संभाल कर खाते हैं कि जल्दी ना ख़त्म हो जाए, अब कोई गालों पर ठंडे हाथ नहीं छुआता है, यहाँ जो बड़े भाई बहन साथ हैं वे अब बड़े और समझदार हो गए हैं सो बचपने वाली हरक़तें नहीं करते हैं। (हाँ कुछ ख़ास लोग इस रवायत को जिंदा रखे हैं)
यहाँ नॉएडा में तो गलियाँ भी नहीं हैं, जिनमे लखनऊ में अपना बचपन और किशोरावस्था बीती। गलियाँ जहाँ दिनभर गली के सचिन और कुंबले में मुकाबला चलता था....जहाँ पतंग लूटने के लिए अपने मोहल्ले से ना जाने कितने मोहल्ले आगे दौड़ते चले जाते थे। गलियाँ जहाँ सर्दियां मौसम था मिल बैठने का और धूप सेंकने के बहाने सुख दुःख बांटने का। वो छतों और दरवाजो पर स्वेटर बुनती औरतें ना जाने कहाँ गायब हो गई......सर्दियों की तहरी चखे अरसा बीत गया.....! इस सर्दी ना तो नए स्वेटर खरीदे और ना ही दस्ताने....हाथ के ग्रीटिंग कब अमरीकी ब्रांड से होते हुए एस एम् एस और ई मेल में बदल गए पता ही नहीं चला.......कुहरा क्या होता है ये तो भूल ही गए।
अब तो गली में भी वो रौनक नहीं, क्यूंकि सर्दी नहीं, अलाव तो गरीबों के लिए है ना और अंगीठी धुंआ बहुत करती है। ना वो औरतें हैं, ना संगी साथी, ना मूंगफली, न पतंग ना मद्धम धूप और ना उस धूप को बिना भेद के बांटते लोग........और जब धूप नहीं है तो भेद है......भेद अपने पराये का क्यूंकि धूप अपनी पराई नहीं होती।

सर्दी की दोपहरों में
छतों पर धूप सेंकती रजाईयां
गुम हैं
सर्दी की शाम बिना अलाव
बिन चाय
गुमसुम है

छतों पर, चौखटों पर
बिनती स्वेटर, उडाती अफवाहें
वो औरतें कहाँ गई
सांझ के धुंधलके में
पार्क में बच्चों की तसवीरें
धुंधला गई

सुबह उठने के बाद
सड़कों पर कोहरा नहीं
इंसानों का सैलाब है
मन नहीं लगता
इस शहर में
मौसम ख़राब है

स्कूल जाते बच्चे
स्कार्फ, लंबे मोजे और दस्ताने
गए हैं भूल
नए घरों के
आधुनिक लाडले
कैब से जाते हैं स्कूल

अंगीठी अब खो गई है
या बदल गई है
एयर कंडीशनर में
सर्दी का मौसम
रह गया है केवल
टीवी की ख़बर में

याद आती है बहुत
अपने शहर की
उस मौसम सर्द की
सजा है हमारे लिए
ये सब
कुदरत बेदर्द की

( क्या आप सब भी मेरी तरह वो सर्दी का पुराना मौसम याद नहीं करते, क्या आपको नहीं लगता कि मौसम में भारी बदलाव आया है, क्या आप नहीं मानते कि हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं......तो वृक्ष लगाए और हरसंभव तरीका अपनाए प्रदूषण में कम से कम योगदान देने के लिए)

3 टिप्‍पणियां:

  1. भई एक लखनवी को दूसरे लखनवी का सलाम, बहुत सुन्दर कविता है, सचमुच लाजवाब!

    ---आपका हार्दिक स्वागत है
    गुलाबी कोंपलें

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  2. सही कहा....बहुत अंतर आ गया है.....मौसम में भी और परिवेश में भी।

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