सोमवार, 31 दिसंबर 2012

बलात्कार का प्रशिक्षण












वो अक्सर बाज़ार से लौटते हुए


कहते थे मुझसे 
क्या लड़की जैसे चलते हो 
दो झोले उठाने में 
थक जाते हो तुम

जब कभी किसी गाने पर
मैं नादान
हिला कर कमर
लगता था नाचने
तब अक्सर कहते थे
चारपाई पर खांसते बुज़ुर्ग वो
ये क्या लड़कियों सा
लगते हो नाचने

खाना बनाने के मेरे शौक पर
मां को
अक्सर आ जाती थी
तेज़ हंसी
कहती थी वो
लड़की पैदा हो गई है घर में
खुश रहेगी बीवी तुमसे

क्रिकेट खेलते हुए
जब भी वो देखता था मुझे
खेलते हुए लंगड़ी टांग
लड़की-लड़की कह कर
चिढ़ाता था
मेरा बड़ा भाई

स्कूल में भी
जब नहीं कर पाता था
मैं नाटे कद का
कमज़ोर सा लड़का
उस मोटे तगड़े साथी से
लड़ाई
लड़की सा होने का ही
मिलता था ताना

रक्षाबंधन के दिन
स्कूल के टीचर
ज़बरन बंधवाते थे राखी
उसी सलोनी से
जिसे देख कर लगता था
बेहद अच्छा
अलग अलग रखी जाती थी
लड़कियों और लड़कों की कक्षा
अलग अलग थे गाने
अलग अलग खेल भी

कच्चे आम तोड़ कर
काले नमक के साथ खाना
छुप कर ही होता था
देख लेती थीं तो
छेड़ती थी भाभियां
कि क्या भैया
आपको तो लड़कियों वाले ही
शौक हैं सब

दाढ़ी बनाने के ब्लेड
खरीदते रहे हम
देख कर लड़कियां
चड्ढियों के भी होर्डिंग पर
दिखती थी
लड़की ही बस
टूथपेस्ट दांतों में लगाने का
मक़सद भी एक ही था
वही जो था
खास खुशबू पसीने से तर
बगलों में छिड़कने का
हाल ही में कहा किसी ने
क्यों रगड़ते हो
लड़कियों वाली क्रीम

और फिर जब
दोस्तों ने मेले, बस और
सड़क पर भी
लड़कियों को न घूरने के लिए
कहा कि
तू तो लड़की है बिल्कुल यार

बस वो सब
घर से लेकर
सड़क तक
उस अनजान
सुनसान
आसान पल के लिए
कर चुके थे पूरा
मेरा प्रशिक्षण
मैं तैयार
बलात्कारी बन चुका
बस साब
एक मौके की तलाश थी....

वो कहते थे कि
मेरी बहन को
पढ़ना चाहिए उस स्कूल में
जहां जाती हैं
सिर्फ लड़कियां
उसके लिए
घर पर नहीं आने चाहिए
लड़कों के फ़ोन
उसकी दोस्ती भी क्यों थी
लड़कों से
जब वो जाती है
लड़कियों के स्कूल

बूढ़े बाबा
जो खुद उठते थे
मेरी मां के सहारे से
डांटते थे अक्सर
मेरी बहन को
कि क्या लड़कों के साथ
खेलती है तू
और फैलाए रहती है
हर वक़्त ही किताबें
हंसती है क्यों
ज़ोर ज़ोर से
जा रसोई में
मदद करो मां की
सीखो कुछ घर के काम
लड़कियां ऐसे अच्छी नहीं लगती

दादी मां को
अक्सर रात टोंका करती थी
कैसी कतरनी सी
चलती है तेरी ज़ुबान
हर बात का जवाब
देती है तुरंत
डांट खाती है
किसी रोज़ मार भी खाएगी
सही हुआ पड़ा तेरे
ज़ोर का तमाचा
ससुर के सामने
आदमी से लड़ा रही थी
ज़ुबान
औरत को इतना गुस्सा
ठीक नहीं है...

मां अक्सर
रात को रोती हुई
आती थी बिस्तर पर
पिता जी को
नहीं देखा था
कभी भी ऐसे रोते छिप कर
मां को आंसू भी
छिप कर बहाने पड़ते थे
अमूमन बहन भी
धीरे धीरे
ऐसे ही रोने की
हो गई थी आदी
चाची, भाभी और कभी कभी
दादी भी

स्कूल में
अक्सर लड़कियों की
पीठ सहलाते थे
गणित वाले वो टीचर
गर्दन के पास
रख कर हाथ
हिंदी वाले मास्साब
समझाया करते थे
विद्यापति का
साहित्य में योगदान
भौतिकी के सर
कई बार अश्लील मज़ाक करते थे
रसायन शास्त्र वाली
मैडम के साथ
वो हंसती थीं खिसियानी हंसी
पीटी की टीचर को देख
हंसते रहते थे
कमीनगी से वो दो
इंस्पेक्शन वाले मास्टर

टीवी पर अक्सर
महिलाओं की मदद के लिए
आगे आ जाते थे
फिल्म निर्देशक
जिनकी हर फिल्म में
ज़रूरी था
एक आईटम नम्बर
नौकरानी पर घर में अक्सर
मुग्ध हो कर मुस्कुराते थे
कभी कभी उसकी
खिसकी साड़ी के पल्लू को
निहारते रहते थे वो मामा हमारे
मुंहबोले चाचा न जाने क्यों
मेरी बहन को करते थे
कुछ ज़्यादा ही लाड़
और हां बड़े भाई का वो दोस्त
अक्सर दे जाता था
अखबार का कवर चढ़ी
न जाने कौन सी ज़रूरी किताबें

हां मेले में
बचता था मैं भीड़ से
लेकिन मेरे बड़े भाई
और कहते थे चाचा भी
कि मेले का मज़ा तो
भीड़ में ही है
अस्पताल में डॉक्टर के
होने पर भी
मरीज़ का हाल
उस कुंवारी नर्स से ही लेते थे
मेरे घर के कई मर्द

और हां याद होगा ही
कहते रहते थे वो अक्सर
औरतों के हाथ में गया जो घर
उसको होना ही है बर्बाद
है न याद...
और फिर मर्द होना ही है
शक्ति का पर्याय
शक्ति अपराजित, असीमित
अराजक

दफ्तर में
झाड़ू लगाने वाली
उस चार बच्चों की मां से लेकर
अपनी महिला सहकर्मियों तक
सबसे करता रहा मैं
छेड़खानी
अपनी मातहतों से
करता रहा मैं
फ्रैंडली जेस्चर
न होने की शिकायत
और वो सीधी सी लड़की
याद तो होगी ही न
जिसके प्रमोशन पर फैलाई थी मैंने
उसके बास के साथ
सोने की अफ़वाह...

और फिर सड़कों पर
अक्सर मैं घूरता था
लड़कियों को
देखता था
उनके शारीरिक सौष्ठव को
देह को देख
करता रहा हर रोज़
आंखों से ही
उनका न जाने कितनी बार
बलात्कार
और चूंकि दुस्साहसी होना
प्रमाण था
उसके पौरुष का
मैं करता रहा कभी
शब्द बेधी वार
कभी नयन सुख के उपचार
कभी छेड़खानी
और बसों, मेट्रो, रेल में
अक्सर शामिल हो जाता था
उनको घेर कर
उनके तन से लिपट कर
जगह जगह डसने वाले
सर्पों के झुंड में

देखिए न
घर से बाहर तक
बलात्कार करने का
मेरा प्रशिक्षण कितना पक्का था
हां अब घूमता था
रात को झुंड में कभी सड़कों पर
तो कभी अकेले
शिकार की खोज में
जानता ही था मैं
समाज और परिवार मेरे साथ है
तो इनसे ही उपजे
पुलिस, कानून और सरकार
क्या बिगाड़ लेंगे मेरा...

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद बढ़िया और सार्थक रचना !
    इस प्रकार की घटनाओं के लिए घर- परिवार, समाज
    कितना जिम्मेदार है बहुत अच्छा समझाया है इस रचना में ,
    अच्छे संस्कार,उचित माहोल, स्वस्थ शिक्षा, ऊँचे जीवन मूल्यों की जानकारी
    बच्चों को घर से ही मिलने चाहिए उसी से उनका स्वस्थ मानसिक शारीरिक विकास संम्भव है !

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  2. वाह कहूंगा तो कविता के मर्म के साथ नाइंसाफी होगी....ये तो सीधे वहां चोट करती है जहां छुपा रखे हैं हमने आदमीपन की कीडे. जो हल पल कुलबुलाते रहते हें हमारे जेहन में एक औरत के खिलाफ. निरंतर साजिश जैसे कोई जंग जीतनी हो आदमी को औरत से....जैसे सदियों का बदला लेना है उसे घायल करके.

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  3. It was a true step wise description of the accountability of the society including our own house which is responsible for such a penetrating patriarchism. It is such a beautiful account.

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